ग़ज़ल
जब-जब आए गंदे लोग
हुए किनारे अच्छे लोग
झूठो की साजिश पे अक्सर
छिपकर रोए सच्चे लोग
झूठो की साजिश पे अक्सर
छिपकर रोए सच्चे लोग
जीना भी अब बहुत कठिन है
जी लेते हैं कैसे लोग
जी लेते हैं कैसे लोग
दुनिया है इक बाग़ मिलेंगे
फूल भी हैं तो कांटे लोग
अच्छे लोगो का टोटा है
फूल भी हैं तो कांटे लोग
अच्छे लोगो का टोटा है
ज़्यादा ऐसे-वैसे लोग
नहीं दुखाना दिल को यारो
करें पाप यह भद्दे लोग
खुद से डरना खुदा से डरना
मगर कहां अब डरते लोग
स्वार्थ का रथ हांक रहे हैं
कहने को हैं अपने लोग
हिम्मत करके चलते जाओ
बन जाते हैं रस्ते लोग
गलत काम करके भी अकसर
बेशर्मी से हँसते लोग
वाह-वाह करते हैं खुद की
ऐसे होते टुच्चे लोग
हत्यारे पकडे जायेंगे
कहाँ जायेंगे बचके लोग
जिनका कुछ ईमान नहीं है
सबके दर पर झुकते लोग
भीतर-भीतर रो लेते हैं
बाहर-बाहर हँसते लोग
नहीं दुखाना दिल को यारो
करें पाप यह भद्दे लोग
खुद से डरना खुदा से डरना
मगर कहां अब डरते लोग
स्वार्थ का रथ हांक रहे हैं
कहने को हैं अपने लोग
हिम्मत करके चलते जाओ
बन जाते हैं रस्ते लोग
गलत काम करके भी अकसर
बेशर्मी से हँसते लोग
वाह-वाह करते हैं खुद की
ऐसे होते टुच्चे लोग
हत्यारे पकडे जायेंगे
कहाँ जायेंगे बचके लोग
जिनका कुछ ईमान नहीं है
सबके दर पर झुकते लोग
भीतर-भीतर रो लेते हैं
बाहर-बाहर हँसते लोग
छिपकर हमले करते रहते
कायर या फिर हिजड़े लोग
काँटों को लज्जित कर देते
फूलों का पथ बनते लोग
अपनी राह बना लेते हैं
इक दिन बढ़ते-बढ़ते लोग
अंतकाल जीते सच्चाई
सदियों से यह कहते लोग
बहकावे में आ गए अकसर
होते हैं कुछ 'बच्चे' लोग
'मार्केट' से असली बाहर..
नकली हैं कुछ सिक्के लोग
बेच खाए ईमान समूचा
कहाँ जायेंगे चल के लोग
महफ़िल उखड गयी घुस आये
पंकज ऐरे-गैरे लोग
पंकज ऐरे-गैरे लोग
(छिप कर हमले करते रहते........ब्लाग जगत में कुछ इसी तरह के लोग है जो ''बेनामी'' बने रह कर दूसरों का दिल दुखानेवाली कटु टिप्पणियाँ करते रहते हैं. मेरे ब्लॉग पर भी ऐसे महानुभाव पधारते रहते है. यह शेर उन्हीं आत्माओं को समर्पित है)
खुद से डरना खुदा से डरना
ReplyDeleteमगर कहां अब डरते लोग
....बेहद प्रभावशाली व प्रसंशनीय अभिव्यक्ति!!!
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ReplyDeleteपंकज जी...बुरा कोई नहीं। पत्थर का जवाब पत्थर न हो तो मजा आता है।
ReplyDeleteअगर हम सामने वाले को पागल कहेंगे तो वे हमें समझदार तो न कहेगा।
वैसे काव्य बहुत दुरुस्त है।
बहुत ही सधे तरीके से आपने ऐसे लोगों की कारस्तानियों को उजागर किया है...
ReplyDeleteप्रकरण से तो अनभिज्ञ हूं, लेकिन ग़ज़ल पसंद आई गिरीश पंकजजी !
ReplyDeleteतमाम अश्आर आपकी गरिमा के अनुरूप हैं ।
छिपकर हमले करते रहते
कायर या फिर हिजड़े लोग
बहकावे में आ गए अकसर
होते हैं कुछ 'बच्चे' लोग
महफ़िल उखड गयी घुस आये
पंकज ऐरे - गैरे लोग
वाह !
bahut sahi abhivyakt kiya hai.
ReplyDeleteपूरी गज़ल-सच बयानी!!
ReplyDelete"जब-जब आए गंदे लोग
ReplyDeleteहुए किनारे अच्छे लोग
झूठो की साजिश पे अक्सर
छिपकर रोए सच्चे लोग"
वाह पंकज भाई गज़ब के शेर हैं, आनद आ गया पढ़कर ...पूरे ब्लाग जगत की कहानी बयान करती यह सामयिक ग़ज़ल संग्रहणीय है ! शुभकामनायें !
!
आज के लोगों की क्या बखिया उधेडी है अपने...वाह..वा...
ReplyDeleteनीरज
धन्य है वे बेनामी जिन्हे आपने यह उम्दा गज़ल समर्पित की है ।
ReplyDeleteबहुत अच्छी रचना है ! तीखे तीर चलाये हैं ! अच्छा लगा !
ReplyDeleteआपने बड़े ख़ूबसूरत ख़यालों से सजा कर एक निहायत उम्दा ग़ज़ल लिखी है।
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