आंकड़ों में मुल्क ये खुशहाल लगता है
पर हकीकत में बहुत कंगाल लगता है
अब यहाँ आलोचनाएँ कौन सुनता है
सच तनिक-सा बोलिए मुंह लाल लगता है
झूठ की बुनियाद पर हैं कुरसियों के घर
सत्य बेचारा बड़ा बदहाल लगता है
प्यार से जो बोलता है वह बड़ा मूरख
बम दिखाए वो ही मालामाल लगता है
कैसे आगे आये कोई रास्ता भी हो
हर तरफ कितना भयानक जाल लगता है
रौशनी क्यों कर न आई अब तलक सोचो
तंत्र अपने लोक का जंजाल लगता है
देखिये अफसर को ये बर्बादी-ए-दौलत
कौन-सा घर से किसी के माल लगता है.
सब्र करना सीख ले पंकज सुखी होगा
काम होने में तो सालोंसाल लगता है
हज़ल बहुत ही दमदार है.. आखिर है किसकी!!!! :) सर कभी आपकी एक नज़र इस नाचीज़ के ब्लॉग पर पहुँच, मार्गदर्शन करेगी क्या? bas ek baar
ReplyDelete" सब्र करना सीख ले पंकज सुखी होगा
ReplyDeleteकाम होने में यहाँ तो साल लगता है "
सत्य वचन !!
Bahut achhi ghazal aaj ke haalat par
ReplyDeleteसटीक अभिव्यक्ति
ReplyDeleteबढ़िया गजल
"सब्र करना सीख ले पंकज सुखी होगा
ReplyDeleteकाम होने में यहाँ तो साल लगता है"...
साल भर में भी काम हो जाए तो गनीमत समझिए...
बहुत भी बढ़िया कटाक्ष करती रचना ....
waah sir nanga sach hai aaj ka aapki ghazal...bahut hi sateek aur chot karti...
ReplyDeleteप्यार से जो बोलता है वह बड़ा मूरख
ReplyDeleteबम दिखाए वो ही मालामाल लगता है
सही फर्माया
आंकड़ों में मुल्क ये खुशहाल लगता है
ReplyDeleteपर हकीकत में बहुत कंगाल लगता है
-एक शेर ही भरपूर है महाराज जी..हर शेर की अदा निराली है. लूट लिया जी आपने!!
प्यार से जो बोलता है वह बड़ा मूरख
ReplyDeleteबम दिखाए वो ही मालामाल लगता है
एक एक लाइन में सच्चाई भरी हुई है सामाजिक पहलुओं को उजागीर करती एक बेहतरीन ग़ज़ल...चाचा जी जी बहुत बहुत बधाई...प्रणाम
झूठ की बुनियाद पर हैं कुरसियों के घर
ReplyDeleteसत्य बेचारा बड़ा बदहाल लगता है
क्या बात है ... क्या बात है !
बहुत बढ़िया लगा ... एकदम सच कहा है आपने ... और किस तरह !
बहुत भी बढ़िया कटाक्ष करती रचना .
ReplyDeleteवाह!
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