मै उजियारा बाँट रहा था मगर हवा को रास न आया
उसने आँधी को भेजा और मेरा जलता दीप बुझाया
एक दीप बुझ जाने पर भी हार नहीं मानी मैंने
फिर से दीप जलाकर मैंने बस आँधी को सबक सिखाया
नेक राह पर चलना भी क्या अब इतना आसान रहा
फिर भी कांटें चुन-चुन मैंने हरदम आगे कदम बढ़ाया
आओ हम सब मिल करके अब अंधकार पर हल्ला बोलें
देखो साथ निभाने खातिर नन्हा दीपक आगे आया
जिसने अपनी राह बनाई मेहनत करके जीवन में,
उस राही को इस दुनिया में सचमुच कोई भूल न पाया
असफलताएँ और नहीं कुछ इम्तिहान है पंकज का
लगता है जी भर कर मैंने अभी नहीं कुछ जोर लगाया
वाह .. बहुत प्रेरणादायक रचना !!
ReplyDeletewaah sakaratmakta jeevan me safalta ke liye bahut zaruri hai...badhiya sandesh
ReplyDeleteबेहतरीन शिक्षाप्रद, रास्ता दिखानेवाली रचना , शुभकामनायें गिरीश भाई !
ReplyDeleteप्रेरणा देती सुन्दर रचना
ReplyDeleteप्रेरणादायक खूबसूरत रचना....
ReplyDeleteचाचा जी बराबर आप की ग़ज़ल पढ़ता आया हूँ शायद ही कभी कोई छूट पता हो वैसे तो हर ग़ज़ल बढ़िया होती है पर आज की ग़ज़ल हमें कुछ ज़्यादा ही खास लगी एक प्रेरणा देती हुई जो खुद में आत्मविश्वास भर दे...बहुत ही भावपूर्ण और लाज़वाब रचना ..इस भतीजे का प्रणाम स्वीकार करें
ReplyDeleteहवा को पीता है
ReplyDeleteतभी तो जीता है
सार्थक पोस्ट
ReplyDeleteसहज सरल सकारात्मक भावयुक्त रचना !
ReplyDeleteआभार ।
असफलताएँ और नहीं कुछ इम्तिहान है पंकज का
ReplyDeleteलगता है जी भर कर मैंने अभी नहीं कुछ जोर लगाया
... बेहतरीन !!!