फिर एकदम नई ग़ज़ल, अपने चहेते सुधी ब्लागर और अच्छे पाठकों के नाम...
बातें बड़ी भली करता है लेकिन वह इनसान भी हो
क्या मालूम देवता बाहर भीतर इक शैतान भी हो
इस दुनिया में भले जनों की अब गुंजाइश मुश्किल है
शायद कहीं किसी कोने में अच्छे का सम्मान भी हो
माना कि तुम बुद्धिमान हो लेकिन इतना तो कर लो
वक़्त पड़े तो नादानों के बीच तनिक नादान भी हो
इतने भी खुदगर्ज़ नहीं तुम हो जाओ इस दुनिया में
अपनी जय-जय करवा लो पर दूजों का जयगान भी हो
खून बहाकर जीवों का जो भक्तों से खुश होता है
लानत भेजूँगा मैं उसको चाहे वह भगवान् भी हो
जीवन है ये धूप-छाँव का खेल यहां पर चलता है
कभी मिलेगा तुमको अमृत कभी यहाँ विषपान भी हो
दुनिया में हम तरह-तरह के लोगों से तो मिलते हैं
अच्छे और बुरे की हमको थोड़ी-सी पहचान भी हो
सच्चा है इनसान अगर तो बेशक वह ये चाहेगा
एक तरफ हो राम अगर तो एक तरफ रहमान भी हो
अगर बहुत ही लम्पट है तो वह क्या इज्ज़त पायेगा
चाहे पढ़ा-लिखा हो पंकज या कोई विद्वान भी हो
बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल है ,अच्छो के सम्मान का जमाना कहाँ ?
ReplyDeleteवाह गिरीश भैया
ReplyDeleteआज तो गजब कर दिया
आभार
बातें बड़ी भली करता है लेकिन वह इनसान भी हो
ReplyDeleteक्या मालूम देवता बाहर भीतर इक शैतान भी हो
वाह जी बहुत सुंदर लगी आप की रचना.
धन्यवाद
एक शब्द काफी है इसके लिये
ReplyDelete"अदभुत" ।
बेहद उम्दा ............हर एक शेर ज़िन्दगी की सच्चाई बताता हुआ !
ReplyDeleteबहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं इस लाजवाब रचना के लिए !
सच्चा है इनसान अगर तो बेशक वह ये चाहेगा
ReplyDeleteएक तरफ हो राम अगर तो एक तरफ रहमान भी हो
अगर बहुत ही लम्पट है तो वह क्या इज्ज़त पायेगा
चाहे पढ़ा-लिखा हो पंकज या कोई विद्वान भी हो .
सुन्दर भाव से सजी अच्छी गज़ल...
...शानदार भावपूर्ण गजल!!!
ReplyDeleteशानदार गजल .आभार ।
ReplyDeleteसच्चा है इनसान अगर तो बेशक वह ये चाहेगा
ReplyDeleteएक तरफ हो राम अगर तो एक तरफ रहमान भी हो
चाचा जी बेहतरीन अभिव्यक्ति .....
बिल्कुल सच कहा आपने आज इंसान की परिभाषा बदल कर बहुत छोटी हो गई है..विचार इतने सूक्ष्म हो गये है कि लगता ही नही इंसान है...राम और रहमान की समझ रखने वाले और उन्हे समान महत्व देने वाले ही वास्तव में सच्चे इंसान है..
बढ़िया भाव से निहित सुंदर रचना के लिए धन्यवाद
सच्चा है इनसान अगर तो बेशक वह ये चाहेगा
ReplyDeleteएक तरफ हो राम अगर तो एक तरफ रहमान भी हो
चाचा जी बेहतरीन अभिव्यक्ति .....
बिल्कुल सच कहा आपने आज इंसान की परिभाषा बदल कर बहुत छोटी हो गई है..विचार इतने सूक्ष्म हो गये है कि लगता ही नही इंसान है...राम और रहमान की समझ रखने वाले और उन्हे समान महत्व देने वाले ही वास्तव में सच्चे इंसान है..
बढ़िया भाव से निहित सुंदर रचना के लिए धन्यवाद
माना कि तुम बुद्धिमान हो लेकिन इतना तो कर लो
ReplyDeleteवक़्त पड़े तो नादानों के बीच तनिक नादान भी हो
खून बहाकर जीवों का जो भक्तों से खुश होता है
लानत भेजूँगा मैं उसको चाहे वह भगवान् भी हो....
दुनिया को रहने लायक और विश्व शांति को कायम इसी तरह रखा जा सकता है ...
शानदार गजल
ReplyDeleteइस दुनिया में भले जनों की अब गुंजाइश मुश्किल है
ReplyDeleteशायद कहीं किसी कोने में अच्छे का सम्मान भी हो
..........बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल .
शब्द विहीन.... बस आपको प्रणाम करता हूँ.
ReplyDeleteशुभकामनाएं इस लाजवाब रचना के लिए !
ReplyDeleteMaaf kijiyga kai dino bahar hone ke kaaran blog par nahi aa skaa
ReplyDeleteअच्छी ग़ज़ल।
ReplyDeleteइस दुनिया में भले जनों की अब गुंजाइश मुश्किल है
ReplyDeleteशायद कहीं किसी कोने में अच्छे का सम्मान भी हो
Excellent.
But who will reply this?
Who will be the judge?
Dear,
Likhte bahut khoob ho,
Jawab nahi Janaab aap ka.
Check ur mailbox.