आंकड़ें भरमा रहे हैं
यूं छले हम जा रहे हैं
पी रहे हैं ग़म बेचारे
वायदों को खा रहे हैं
हमने केवल सच कहा था
आप क्यों चिल्ला रहे हैं
सत्य कितना है अपाहिज
झूठ को दौड़ा रहे हैं
जिनपे करते थे यकीं हम
लूट कर वो जा रहे हैं
लूटने कुछ लोग बस्ती
वेश धर कर आ रहे हैं
आदमी की देख केंचुल
साँप भी शरमा रहे हैं
क्या गलत कुछ हो गया है
आप क्यूं घबरा रहे हैं
खुद तो करते ऐश हमको
ख्वाब ही दिखला रहे हैं
न्याय को सूली मिली है
पाप जी मुस्का रहे हैं
तुमने दिल से है पुकारा
दिल लिये हम आ रहे हैं
दिल लिये हम आ रहे हैं
एक नकली ज़िंदगी पर
लोग बस इतरा रहे हैं
साथ क्या ले जायेंगे वे
धन बंटोरे जा रहे हैं
कुर्सियाँ कब तक टिकी हैं
उनको हम समझा रहे हैं
दर्द ही अपनी धरोहर
दर्द 'पंकज' गा रहे हैं
हमने केवल सच कहा था
ReplyDeleteआप क्यों चिल्ला रहे हैं
सत्य कितना है अपाहिज
झूठ को दौड़ा रहे हैं
वर्तमान युग के यथार्थ को उद्घाटित करती अच्छी पंक्तियां।
इस उत्तम रचना के लिए बधाई, पंकज जी।
बहुत ही सुंदर....सत्य का बोध कराती
ReplyDeletegirish bhayi siyast ko nngaa kr dene vaali aapki yeh rchnaa khud jhunthe or mkkar netaaon ko aayna dikhaa rhi he . akhtar khan akela kota rajsthan
ReplyDeleteबहुत बदिया.. सभी अशआर पसंद आये.
ReplyDeleteहर शेर लाजवाब और बेमिसाल ..
ReplyDeleteहर एक शेर कमाल है लेकिन ये शेर बहुत अच्छे लगे
ReplyDeleteसत्य कितना है अपाहिज
झूठ को दौड़ा रहे हैं
लूटने कुछ लोग बस्ती
वेश धर कर आ रहे हैं
आदमी की देख केंचुल
साँप भी शरमा रहे हैं
सुन्दर गज़ल के लिये बधाई।
दर्द ही अपनी धरोहर
ReplyDeleteदर्द 'पंकज' गा रहे हैं !!!
नव वर्ष की मंगलमय कामनाएं आप और आप के गीतों के लिए
लूटने कुछ लोग बस्ती
ReplyDeleteवेश धर कर आ रहे हैं
आदमी की देख केंचुल
साँप भी शरमा रहे हैं
शानदार रचना पर बधाई. भईया प्रणाम.