Monday, May 9, 2011

नई ग़ज़ल / नफ़रत ही नफ़रत बस पाए बस्ती में........

बिना कुछ कहे...फिर एक ग़ज़ल..इसी भरोसे के साथ कि बात बोलेगी शायद, हम नहीं . 
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आ कर हम बेहद पछताए बस्ती में
कितने हो गए लोग पराए बस्ती में

पानी तक के लिए नहीं पूछा सब ने
पता नहीं क्या सोच के आए बस्ती में

हम तो प्यार लुटाने आए थे लेकिन
नफ़रत ही नफ़रत बस पाए बस्ती में

प्यार हमारा सच्चा है लेकिन हाए
बिन दौलत यह काम न आए बस्ती में

बदल गए हालात देख कर लोग सभी
अपनों को पहचान न पाए बस्ती में

सुन्दर चेहरा है थोड़ी-सी दौलत भी
इस पर वो नादां इतराए बस्ती में

डरता हूँ के अगर मर गया मैं तनहा
लाश हमारी कौन उठाए बस्ती में

सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो 
किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में

कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में

28 comments:

  1. बदल गए हालात देख कर लोग सभी
    अपनों को पहचान न पाए बस्ती में

    ...आज के यथार्थ का बहुत भावपूर्ण और संवेदनशील चित्रण...हरेक शेर दिल को छू जाता है..

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  2. सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
    किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में

    कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
    कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में

    बहुत सुन्दर गज़ल ..सच को कहती हुई

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  3. कहकर बीती यादों ने बुलवाया था
    यार मेरे मरते हैं मुझ पर बस्ती में

    ये एक कच्चा शेर और सर...
    सच्ची और अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई..

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  4. "कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
    कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में"

    वाकई यहाँ कोई नहीं मुस्कराता, एक दूसरे को देख कर ! शुभकामनायें !

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  5. कोई नहीं रोयेगा जग में ,
    जब तक पंकज मुस्काए बस्ती में

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  6. सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
    किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में

    सब जानते हे इस बात को फ़िर भी अनजान बने फ़िरते हे, बहुत सुंदर गजल, धन्यवाद

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  7. कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
    कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में

    हमेशा की तरह शानदार। आभार।

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  8. basti bhi vahi ,basnik bhi vahi bas---

    ' BASTI KO BASANA KHEL NAHIN ,VAH BASTE BASTE ,BASATI HAI '
    rochak laga dristikon ---

    आ कर हम बेहद पछताए बस्ती में
    कितने हो गए लोग पराए बस्ती में

    aabhar ji .

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  9. हालात का सटीक चित्रण है।

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  10. सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
    किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में


    कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
    कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में


    खूबसूरत ग़ज़ल है... बेहतरीन!

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  11. सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
    किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में
    waah

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  12. प्यार हमारा सच्चा है लेकिन हाए
    बिन दौलत यह काम न आए बस्ती में
    संवेदनशील शेर, बहुत सुंदर गजल.......

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  13. प्यार हमारा सच्चा है लेकिन हाए
    बिन दौलत यह काम न आए बस्ती में...
    दौलत सब पर भारी है , जबकि सभी जानते हैं सबकुछ यही रह जाना है ...
    बेहतरीन !

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  14. कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
    कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में

    एकदम बढ़िया शब्द और रचना ---मुस्कुराते रहे यु ही बस्ती में ...

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  15. bahut achchi gajal.aaj ki matalabi duniya ki asliyat bayan karati hui.dunia ki aajkal yahi reet ho gai hai.badhhi aapko.

    please visit my blog also and leave the comments.thanks

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  16. bahut aacha laga padkar ..........................aapko badhai...................

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  17. bahut hi bhavpurn abhivyakti,
    dil ke ass pass, aisa hi kuch apna bhi hal he!

    bas main bhi yahi geet gungunata hun aajkal

    "ik din bik jayega mati ke mol, jag me reh jayenge pyare tere bol"


    sundar shaandar, messgae deti hui aapki is rachna ko mera salaam!

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  18. भीड़ भरे शहर गांव और हर आदमी निपट अकेला ...सब इसी डर में जीते हुए... गज़ल की आखिरी पंक्तियों ने जता दिया कि मुस्कुराना भी मुश्किल प्रतीत होता है बहुत अच्छी गज़ल

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  19. सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
    किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में बहुत सुंदर गजल. आभार।......

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  20. गिरीश जी
    आ कर हम बेहद पछताए बस्ती में
    कितने हो गए लोग पराए बस्ती में
    अच्छे मतले से सजी इस ग़ज़ल के शेर भी काबिले दाद हैं

    डरता हूँ के अगर मर गया मैं तनहा
    लाश हमारी कौन उठाए बस्ती में

    सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
    किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में

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  21. प्यार हमारा सच्चा है लेकिन हाए
    बिन दौलत यह काम न आए बस्ती में

    जिंदगी की सच्चाईयों को
    बयान करते हुए लाजवाब शेर ....
    बहुत ही अच्छी और यादगार ग़ज़ल !!

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  22. प्यार हमारा सच्चा है लेकिन हाए
    बिन दौलत यह काम न आए बस्ती में

    बदल गए हालात देख कर लोग सभी
    अपनों को पहचान न पाए बस्ती में

    बदलते सामाजिक और नैतिक परिदृश्य को रेखांकित करती अच्छी ग़ज़ल।

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  23. डरता हूँ के अगर मर गया मैं तनहा
    लाश हमारी कौन उठाए बस्ती में


    बहुत सुंदर बधाई !

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  24. "कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
    कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में"

    हमेशा की तरह लाज़वाब गज़ल है भईया...
    सादर प्रणाम....

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  25. सब कुछ इक दिन छोड़ के जाना है यारो
    किसको कौन यहाँ समझाए बस्ती में
    कोई तो इक चेहरा हो मुसकान भरा
    कब तक पंकज ही मुस्काए बस्ती में

    लाज़वाब गज़ल ....

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