सुधी पाठक जानते ही है की उर्दू में तरही मिसरा दिया जाता है, जिस पर ग़ज़ल कहनी पड़ती है. जैसे हिंदी में ''समस्यापूर्ति'' की प्रथा रही है. मुझे पिछले दिनों एक लाइन दी गयी-''शायद वो मेरा ख़्वाब था, शायद ख़याल था''. इस पर पूरी ग़ज़ल कहनी थी. मैंने कोशिश की. वही कोशिश यहाँ पेश कर रहा हूँ. शायद इसे भी आपका स्नेह मिले. देखिये...
हर आदमी सुखी था वहां क्या कमाल था.
''शायद वो मेरा ख़्वाब था, शायद ख़याल था''
रोटी के वास्ते बिकी बाज़ार में अस्मत
यूं भूख मेरी मिट गयी लेकिन मलाल था
जम्हूरियत को कब तलक देते रहें लहू
इंसान तो मरते रहे ज़िंदा सवाल था
सच के लिए लड़ा, मरा इन्साफ के लिए
वह आदमी नहीं था ज़िंदा मिसाल था
मिल जाएगा इनाम तो ईमान को बेचा
जिसने लुटाया खुद को वो ही मालामाल था
वो आदमी सही है मेरा ये ख़याल था
लेकिन असलमें वो भी फरेबी का जाल था
सच बोलता है वो मगर ये बोलता है क्यूं
साहब की नज़र में यही पंकज बवाल था
सच के लिए लड़ा, मरा इन्साफ के लिए
ReplyDeleteवह आदमी नहीं था ज़िंदा मिसाल था
खूबसूरत शब्द , बधाई
सच के लिए लड़ा, मरा इन्साफ के लिए
ReplyDeleteवह आदमी नहीं था ज़िंदा मिसाल था
बढ़िया ग़ज़ल भईया...
सादर...
बहुत खूबसूरत गज़ल ... आज सच कौन सुनना चाहता है ?
ReplyDeleteयथार्थपरक बेहतरीन ग़ज़ल...
ReplyDeleteSach kahun to ....babal likha hai..
ReplyDeleteखूबसूरत गजल...आभार.
ReplyDeleteसादर,
डोरोथी.
सच के लिए लड़ा, मरा इन्साफ के लिए
ReplyDeleteवह आदमी नहीं था ज़िंदा मिसाल था
हर शेर यथार्थ के भावों से तराशे हैं आपने
sunder gazal....
ReplyDeleteरोटी के वास्ते बिकी बाज़ार में अस्मत
ReplyDeleteयूं भूख मेरी मिट गयी लेकिन मलाल था
आपकी संवेदन्शीलता को सलाम , कथ्य ,शब्द दोनों ही प्रशंसनीय , शुभकामनायें जी /
shabd heen kar diya..pahle do char baar padhunga phir comment karunga..sadar pranam ke sath
ReplyDeleteबेहद लाजवाब गज़ल्…………हर शेर यथार्थ को उजागर करता हुआ।
ReplyDeleteसच के लिए लड़ा, मरा इन्साफ के लिए
ReplyDeleteवह आदमी नहीं था ज़िंदा मिसाल था
यथार्थ को उद्घाटित करती ग़ज़ल।