Sunday, September 20, 2009

आज ईद हैमुबारक हो सबकोहर धर्म हमें प्यारा होहम ईद भी मनाये, दीवाली भीबड़ा दिन भीसब त्यौहार हमारे हैमैंने कभी रमजान पर लिखा था , दो शेर ही याद रहे है. देखे- रोजा इक फ़र्ज़ मुसलमान के लिए/ तकलीफ जो सहते है रमजान के लिए/ बाद मरने के ही ज़न्नत मिलेगी/ थोडी तो हिद्दत सहो दय्यान के लिए..। दय्यान यानि स्वर्ग का वह आठवा दरवाज़ा जो रोजेदारों के लिए खुलता हैबहरहाल, ईद पर बिल्कुल ताज़ा रचना पेश है, इस विश्वास के साथ की हम सकल्प ले की जाती-धर्म की दीवारे तोडेंगेमिलजुल कर रहेंगेऐसा समाज बनाना है, जहा लोग कहे-सुबह मोहब्बत, शाम मोहब्बत /अपना तो है काम मोहब्बत / हम तो करते है दोनों से / अल्ला हो या राम मोहब्बत / देखिये मेरे शेरईद मुबारक....मीठा खाए, मीठा बोलें...जीवन में हम मिसरी घोलें

आज ईद है.....

आओ, सबको गले लगाओ आज ईद है
सेवई खाओ और खिलाओ आज ईद है
बैर कोई दिल में पालो मेरे भाई
दुश्मन को भी पास बुलाओ आज ईद है
कोई इक त्यौहार किसी का नही रहे अब
सारे बढ़ कर इसे मनाओ आज ईद है
रोजे रख कर हुई इबादत देखो भाई
सुबह-शाम केवल मुस्काओ
आज ईद है
ईद, दीवाली, होली सब त्यौहार हमारे
पागल दुनिया को समझाओ
आज ईद
गिरीश पंकज

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