इस बार पद नहीं, एक व्यंग्य-गीत
साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
जिसे मिला वो डट कर खाए, नहीं किसी ने मौका छोडा.
(१)
नेता मतलब नएलुटेरे,
बैठे है कुर्सी को घेरे.
राजनीति में अपराधी है.
बहुत बड़ी अब ये व्याधी है.
कब तक सोती रहेगी जनता, अब तो जागे लिए हथोडा ...
साधो कदम - कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
(२)
राजनीति अब तो धंधा है,
वेश्या से ज्यादा गन्दा है.
अपराधी औ पैसे वाले,
जीत रहे अब ये ही साले.
कोई पूरा देश खा रहा, कोई खाए थोडा-थोडा.
साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
(३)
स्विस बैंक में देश का माल,
और यहाँ जनता कंगाल?
इन्हें जेल में भेजो जल्दी,
कब छूटे दिल्ली की हल्दी?
जनता बेचारी क्या बोले, सबने तो इसका दिल तोडा.
साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
(४)
रोज़ मर रहे अपने बापू,
कहां हैं तेरे सपने बापू?
नाम तेरा लेते पाखंडी.
आज सियासत बन गयी रंडी.
रजधानी में हत्यारे सब, लोकतंत्र है या है फोडा?
साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
(5)
कितने हम नाम गिनाएंगे,
ये सब तो मारे जायेंगे.
कहाँ गए सब अच्छे लोग,
थे त्यागी औ सच्चे लोग.
अच्छे-अच्छे मुंह की खाते, जनता ने इनका दिल तोडा.
साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
(६)
स्विस बैंक से पैसे लाओ,
भारत को खुशहाल बनाओ.
हर दोषी को जेल में डालो,
देश की इज्जत नहीं उछालो.
इन्हें छोड़ दो चौराहे पर, जनता को दे दो बस कोडा..
साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
-गिरीश पंकज
रजधानी में हत्यारे सब, लोकतंत्र है या है फोडा?
ReplyDeleteबिना फ़ोड़ा, फ़ोड़े नही हो्गा ईलाज
अब तो फ़ोड़ा फ़ोड़ना ही है आज
तभी तो बच पाएगा हमारा समाज
बधाई अब प्रारंभ होना चाहिए काज
इस विलक्षण रचना के लिए साधुवाद स्वीकार करें गिरीश जी...बहुत ही जबरदस्त कविता...एक दम सच्ची बात कहती..वाह...
ReplyDeleteनीरज
wah , kash aisa ho pata, girish ji bahut sahi bindaas likh rahe hain badhaai sweekaren.
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