ज़िंदगी में ज़िंदगी की इक कमी बन कर रहे
कैसे उनकी निभ सकेगी दो घड़ी भी दोस्तो
हर घड़ी जो बस हमी हैं, बस हमी बन कर रहे
कौन उसको भूल पाया है सदा संसार में
आदमी के बीच में जो आदमी बन कर रहे
एक बच्चा बोलता है तोतली बोली में सुन
काश के यह आदमी मेरी हंसी बन कर रहे
सूख कर बंजर हुए तो कौन आएगा इधर
वो दिलों में राज करता जो नदी बन कर रहे
मज़हबों के नाम पर गर खूँ बहे इनसान का
शर्म है के आदमी यूं मज़हबी बन कर रहे
तेरे पीछे एक दिन बेशक ज़माना आएगा
गर हमेशा तू सभी की इक ख़ुशी बन कर रहे
देवता से कम नहीं लगता हमें वह आदमी
जो अँधेरे के शहर में रोशनी बन कर रहे
उस नदी से रश्क करता है समंदर दोस्तो
प्यास जो सबकी बुझाए तिश्नगी बन कर रहे (तिश्नगी-प्यास)
ज़िंदगी का पाठ ये आंसू सिखाते है हमें
आदमी तू आँख के अन्दर नमी बन कर रहे
कैसे उसको हम कहेंगे आदमी 'पंकज' यहाँ
चंद पैसों के लिए जो बस 'डमी' बन कर रहे
कौन उसको भूल पाया है सदा संसार में
ReplyDeleteआदमी के बीच में जो आदमी बन कर रहे...
हर शेर उम्दा...बहुत बढिया गज़ल...
आनंद आ गया जी फुल बटा फुल
एक बच्चा बोलता है तोतली बोली में सुन
ReplyDeleteकाश के यह आदमी मेरी हंसी बन कर रहे
-बहुत बढिया
उस नदी से रश्क करता है समंदर दोस्तो
ReplyDeleteप्यास जो सबकी बुझाए तिश्नगी बन कर रहे
प्यास का निरंतर बना रहना भी तरक्की का बायस होता है,
बनी रहे ये प्यास, बने रहे ये पीने वाले, बनी रहे ये मधुशाला
आभार
कौन उसको भूल पाया है सदा संसार में
ReplyDeleteआदमी के बीच में जो आदमी बन कर रहे
ये दो मिसरे तो बहुत बढ़िया हैं... आज मेरे एक बहुत ही अज़ीज़ मेरा साथ छोड़कर इस दुनिया से रुख्सत हो गये.. मैंने उन पर अपने ब्लॉग में एक पोस्ट भी लिखी... काश आपकी ये दो लाइन भी शामिल कर पाता.. उनपर एकदम सटीक बैठती हैं..
http://abyazk.blogspot.com/
बहुत खूब ।
ReplyDeleteanupam rachna.
ReplyDeleteतुम हमारे हो न हो पर बात सच्ची है यही
ReplyDeleteहम जहाँ भी हैं तुम्हारे मित्र ही बन कर रहे..