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झूठे जब आदर्श दिखाने लगते हैं
पहले से ज्यादा गंधाने लगते हैं
जिनका पेट भरा होता है वे बढ़ कर
उपवासों का मर्म बताने लगते हैं
वंचित को मिल जाए कुरसी तो अक्सर
अपने जन को वही सताने लगते हैं
छल-छंदों से ही दुनिया खुश रहती है
इसीलिये हम भी मुसकाने लगते हैं
खाली जेब रहे तो कौन इधर आए
हों पैसे तो सारे आने लगते हैं
वर्त्तमान हो जैसा लेकिन यह सच है
बीते दिन ही बड़े सुहाने लगते है
अगर मुसीबत आ जाये तो हम केवल
अपनी हिम्मत आजमाने लगते हैं
स्वारथ पूरा ना हों तो फिर देखा है
अपने ही पंकज बेगाने लगते हैं
वर्त्तमान हो जैसा लेकिन यह सच है
ReplyDeleteबीते दिन ही बड़े सुहाने लगते है ...
सार्थक ग़ज़ल ........ हक़ीकत के शेरों से सजी ग़ज़ल .......
वर्त्तमान हो जैसा लेकिन यह सच है
ReplyDeleteबीते दिन ही बड़े सुहाने लगते है
-टेलीपैथी-आज की मेरी आ रही पोस्ट इसी पर है..वाह!!
एक एक लाइन सच बयाँ करती है..बहुत बढ़िया ग़ज़ल गिरीश जी धन्यवाद स्वीकारें!!!
ReplyDeleteहमको तो पंकज वे ही मन-भाते हैं
ReplyDeleteदिल छूती जो गजल सुनाने लगते हैं.
दिल छूती गजल
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