''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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मुझे गरीबी में रहने दो

>> Tuesday, October 13, 2009

सच की राह में दुश्वारी है.
लेकिन  अपनी तैयारी है.

चाहे जितनी तकलीफें हों,
इन  सबसे अपनी यारी है

पास तुम्हारे गर दौलत है
अपने    हिस्से  खुद्दारी  है.

मुझे  गरीबी  में  रहने  दो
दौलत  भी  तो बीमारी  है.

बिछे  जा  रहे ये चरणों पर
कुछ  पाने  की  लाचारी है.

 जितना चाहे  इम्तिहान लो
मैंने  हिम्मत  कब  हारी है

मरते हैं   सच  कहने  वाले
सदियों से यह सब जारी है





4 टिप्पणियाँ:

ACHARYA RAMESH SACHDEVA October 13, 2009 at 2:31 AM  

गरीब कौन है और कौन नहीं
इसका ना हिसाब करो।
जो भी करो बस दिल से करो
कभी ना टाईम पास करो।।
ऐसा करोगे तो एक दिन
टाईम तुम्हें, पास कर जाएगा।
बित गया वक्त यदि तो
हाथ कभी नहीं आएगा।
जिसका वक्त बिता देता है,
वह गरीब बन जाता है।
जो वक्त को समझ लेता है
वही धनवान बन जाता है।

योगेश स्वप्न October 13, 2009 at 5:46 AM  

wah girish ji , eke se badhkar ek behatareen rachnayen post kar rahe hain, prashansa ke shabd kam padne lage hain.

गिरीश पंकज October 13, 2009 at 10:55 PM  

yogesh bhai, blog k jariye apne jivan ka shreshth logo tak pahuchaoon. koshish jari hai. se n sune koi meri pukar. log padhe aur soche. amal me laa sake to aue sundar. blog mere liye ek madhyam hai, bhadas nikalne ka nahi, pyar baantane ka, sadbhav failane ka...

संजय भास्कर March 1, 2010 at 6:02 AM  

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

सुनिए गिरीश पंकज को

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