अपनी जान जलाते क्यों हो
लोगों को समझाते क्यों हो
हृदयहीन बस्ती में जा कर
अपने शेर सुनाते क्यों हो
भीतर-भीतर दर्द समेटे
बाहर तुम मुस्काते क्यों हो
गूंगी-बहरी कुरसी को तुम
दर्देदिल बतलाते क्यों हो
जहां तुम्हारी इज्ज़त न हो
उस दर पे तुम जाते क्यों हो
अगर प्यार सच्चा है तो फिर
इसको सदा छिपाते क्यों हो
माना के अहसान कर दिया
हरदम इसे जताते क्यों हो
दिल से दिल तो ना मिल पाया
केवल हाथ मिलाते क्यों हो
लोग पढ़ेंगे तेरा लिक्खा
खुद को यूं बहलाते क्यों हो
प्यार नहीं है 'पंकज' से तो
बार-बार यूं आते क्यों हो
गिरीश जी
ReplyDeleteबहुत ही सीधे लहजे में कही गयी एक भाव पूर्ण रचना......
ग़ज़ल अच्छी है भाई.!
बहुत ही सहज सरल शब्दों में आप ने गम्भीर बातें कह दीं.
ReplyDeleteसभी शेर बहुत अच्छे हैं.
जहां तुम्हारी इज्ज़त न हो
ReplyDeleteउस दर पे तुम जाते क्यों हो
WAAH ! WAAH ! WAAH !
BAHUT HI UMDA...SABHI KE SABHI SHER LAJAWAAB !!!
BAHUT HI SUNDAR RACHNA....
ग़ज़ल अच्छी है ...
ReplyDeletegambheerta liye huye behatareen rachna.
ReplyDelete'सलिल' कद्रदां मित्र तुम्हारा
ReplyDeleteउस बिन गजल सुनते क्यों हो?...