''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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महावीर वचनामृत -12

>> Sunday, March 14, 2010


बहुत दिनों के बाद फिर हाज़िर हूँ. महावीर वचनामृत के साथ. कही लोग बोर तो नहीं हो रहे...? लेकिन ऐसा लगता नहीं. सुधी लेखक-पाठक टिप्पणियाँ कर रहे है.बहुत जल्द कुछ् और नयी रचनाएँ पेश करूंगा.

(109)
धर्म-प्राण जन से रखें, जीवन में अनुराग।
प्रियभाषी सम्यक वही, भव्य परम है भाग।।

(110)
निर्मल मन प्रवचन करे, तपी, कवि जो होय।
वे ही सच्चे धारमिक, सबका अंतस धोय।।

(111)
चरित्र-शून्य जो हो गया, शास्त्र-ज्ञान बेकार।
लाखों दीप न दे सकें, अंधे को उजियार।।

(112)
अल्पज्ञान भी है बहुत, हो चरित्र गर पास।
चरित्रहीन ज्ञानी बहुत, लेकिन वह बकवास।।

(113)
राग-द्वेष व्यापे नहीं, सुख-दु:ख में समभाव।
ऐसे भिक्षु से सदा, रक्खे गाँव लगाव।।

(114)
जो मानव हित सोचते, करते अल्पाहार।
उन्हें वैद्य की फिर कभी, पड़ती ना दरकार।।

(115)
ज्यादा रस सेवन करो, तो बढ़ता उन्माद।
मीठे फल हो पेड़ पर, करे पक्षी बर्बाद।।

(116)
कटूवचन, चोरी-जुआ, नशा-नारि का संग।
व्यसन रहे ये तो सभी, नित करते बदरंग।।

(117)
माँस खाय, मदिरा पिये, फिर द्यूत का साथ।
एक बुराई से मनुज, सब दोषों का नाथ।।

(118)
माँस खाये जो विप्र तो, पतित हुआ घनघोर।
मद्यपान भी जो करे, लाय दु:खों का दौर।।

7 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर March 14, 2010 at 5:31 AM  

welcome back girish pankaj ji

संजय भास्कर March 14, 2010 at 5:32 AM  

bahut hu sunder parastuti ke sath

ललित शर्मा March 14, 2010 at 6:51 AM  

गिरीश भैया,
महावीर वचनामृतरस का पान किया
आपने तो गागर मे सागर भर दिया

दिल्ली से कब पधारे?

योगेश स्वप्न March 14, 2010 at 6:55 PM  

ek ek doha anmol, girish ji kabhi kabhi shabd kam pad jate hain...........

शहरोज़ March 14, 2010 at 11:38 PM  

aapke shabd aur mahaweer k vichaar !! bhala ismein boriyat jaisi koft kyon hogi..aap zihan se aise sawaal nikaal hi den.aapki har post ka besabri se intizaar rahta hai.

श्याम कोरी 'उदय' March 15, 2010 at 5:57 AM  

....डुबकी लगा लिये, मन प्रसन्न हो गया !!!!

शरद कोकास March 15, 2010 at 9:05 AM  

यही सचमुच अमृत है ।

सुनिए गिरीश पंकज को

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