''सद्भावना दर्पण'

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तेईस मार्च आता है अनगिनत सवालों के साथ

>> Sunday, March 21, 2010

''सबसे  खतरनाक होता है हमारे सपनो का मर जाना...' पंजाब के क्रांतिकारी कवि पाश की ये काव्य-पंक्ति आज याद आ गयी. २३ मार्च को उनकी हत्या कर दी गयी थी. शायद इसलिए कि यही वह दिन है जब महान क्रांतिकारी भगत सिंग, सुखदेव एवं राजगुरू को भी फांसी पर लटकाया गया था. २३ मार्च हमारे लिए इसलिए भी यादगार है, कि इसी दिन महान समाजवादी चिन्तक डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्म हुआ था. नयी पीढ़ी के लोग शायद इस नाम से ठीक परिचित भी न हों. इसलिए मन कर रहा है, कि उनके बारे में कुछ कहूं. यह शख्स भी किसी क्रांतिकारी से कम नहीं था. २३ मार्च १९१०  को जन्मे लोहिया ने आज़ादी की लड़ाई में जबरदस्त योगदान किया. यह उनका जन्मशताब्दी वर्ष है, लोहिया जी  महात्मा गाँधी से प्रभावित थे, लेकिन वक्त आने पर वैचारिक विरोध भी दर्ज करने वाले थे. बहुत कम लोगो को इस बात की जानकारी है, कि आज़ादी पाने के बाद बंगाल में हुए दंगों का शांत करने के लिए महात्मा गाँधी ने लोहिया की भी मदद ली थी. आजादी पाने के  बाद एक लोकतांत्रिक भारत का चेहरा गढ़ने में लोहिया की भी भूमिका महत्वपूर्ण रही. वे सांसद रहे.और नेहरू जी के ज़माने में रहे. पुराने लोग बताते है, कि सदन में लोहिया को सुनना एक अनुभव हुआ करता था. वे व्यवस्था विरोधी थे और जनता के हित में रत रहने वाली सरकार चाहते थे. वे गैर कांग्रेसवाद के जनक थे. लोहिया के चिंतन से प्रभावित हो कर उस दौर के अनेक भारतीय लेखक लोहिया के चिंतन को अपने साहित्य में उतारने लगे थे. और गर्व से कहते थे कि हम लोहियावादी है. ये लोग आज भी अपने आप को लोहियावादी मानते है. आज भारत में एक भी नेता ऐसा नहीं है, जिसे देख कर हम कह सकें कि हम फलानेवादी है. दरअसल लोहिया जैसी पीढ़ी अब दुबारा होने से रही. इसलिए हम उनके नाम का सहारा लेने पर मजबूर है. लोहिया की महानता या सोच को समझाना हो तो केवल एक उदहारण ही पर्याप्त है. जब लोहिया के प्रयासों से दक्षिण में सरकार बनी. उस सरकार ने आंदोलनकारियो पर गोली चलाई तो लोहिया जी ने कहा था, कि इस सरकार को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. दुर्भाग्य कि सरकार ने इस्तीफा नहीं दिया. खैर, ये लम्बी कहानी है. मै एक बात दावे के साथ कह सकता हूँ, कि अगर करुणा, समता-ममता, सद्भवा से भरे समाज का निर्माण करना है तो केवल लोहिया के रस्ते पर चल कर ही संभव है. लोहिया के चिंतन में गांधी का दर्शन भी शामिल है, तो भगत सिंह का साम्यवाद भी नज़र आता है. लोहिया जी के बारे में अगर पढ़ना या कुछ जानना है, तो श्री  मस्तराम कपूर द्वारा सम्पादित लोहिया रचनावली (अनामिका प्रकाशन,नयी दिल्ली) ज़रूर पढ़नी  चाहिए.लोहिया एक ऐसे महान नेता थे. जिन्होंने भाषा के सवाल पर दमदारी के साथ कहा कि इस देश से अंगरेजी हटनी चाहिये और हिदी ही नहीं भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा बढ़ानी चाहिए.  बहरहाल, २३ मार्च को ध्यान में रखते हुए एक कविता पेश कर रहा हूँ.

हमारे सपने जिंदा थे इसीलिए हमें वैसे लोग मिले, 
जैसे अब नहीं मिलते.  
तेईस मार्च आता तो है लेकिन 
उस तरह के सपने देखने वाले और जीने वाले लोगों को नहीं पाता. 
हम केवल स्मृति की कंदील जला कर 
स्याह रातो का मुकाबला करने की
असफल कोशिशे करते है, और तिल-तिल मरते है.
सोचते है, कि कब कोई भगत सिंह आएगा
कब कोई पाश रचेगा क्रान्ति के गीत 
कब कोई लोहिया आयेगा और 
गोली दागने वाली सरकारों के खिलाफ सड़को पर उतरेगा और जेल जाएगा
लोहिया  जिसका जीवन आजादी के पहले और 
आजादी के बाद भी जेलों में बीता.
लोहिया जिसने महिलाओ और दलितों के ह़क के लिए आवाज़ उठाई 
सप्तक्रान्ति का नारा लगाया. 
क्रान्ति तो क्या आती लेकिन एक आग जल गयी और अब तक जल रही है.
अगर बनाना है नया समाज 
तो हमको सोचना होगा आज 
कि लोहिया के रस्ते पर चलें या 
जीते रहें आँख मूँद कर. 
तेईस मार्च आता है अनगिनत सवालों के साथ 
और लौट जाता है उत्तर की प्रतीक्षा में....
अगले साल फिर आने के लिए.....
ये तेईस मार्च

4 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर March 21, 2010 at 11:29 PM  

बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

शहरोज़ March 24, 2010 at 4:36 AM  

bhai sahab aapne lohiya ji ka zikr kar achcha kiya....kai nai baaten bataayen aapne..aabhaar.

योगेन्द्र मौदगिल March 24, 2010 at 5:57 AM  

saarthak post bhai ji.....

योगेन्द्र मौदगिल March 24, 2010 at 5:57 AM  

saarthak post bhai ji.....

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