''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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ग़ज़ल/ सारे तथाकथित....

>> Tuesday, August 10, 2010

यह ग़ज़ल उन मित्रों के लिये हैं जो बहुत अच्छे इनसान है मगर तथाकथित लोगों से हैरान-परेशान है. आज हम यही देख रहे है हर कहीं तथाकथित लोग ही नायक बने हुए है. फिर भी....मैं मानता हूँ कि एक दिन सच जीतता है. प्रतिभा का सम्मान मिलता है. तो....प्रस्तुत है.. आपके जैसे अच्छे लोगों के मन पीड़ा को स्वर देने वाले कुछ शेर.....

यहाँ-वहाँ अब छाये दिखते सारे तथाकथित
भरे हुए हैं सत्ता के गलियारे तथाकथित  

जाने कितने सपनों की हत्याएं कर डालीं
घूम रहे हैं मस्ती में हत्यारे तथाकथित  

नकली सिक्के यहाँ चल रहे ये कैसा बाज़ार 
असली हो गए है अब तो बेचारे तथाकथित

हमने तुमको प्यार किया पर तुम तो बदल गए
क्या मालूम था निकलोगे तुम प्यारे तथाकथित

मुझ तक आने से पहले उजियारे लुप्त हुए 
भेजे थे चन्दा ने हमको तारे तथाकथित

बहुत दिनों तक खून के आँसू रोई सच्चाई 
आखिर इक दिन वही हुआ कि हारे तथाकथित   

22 टिप्पणियाँ:

सतीश सक्सेना August 10, 2010 at 9:36 AM  

हार इनकी ही होनी चाहिए ! शुभकामनायें पंकज भाई

संजय भास्कर August 10, 2010 at 9:51 AM  

हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

संजय भास्कर August 10, 2010 at 9:51 AM  

आपने बड़े ख़ूबसूरत ख़यालों से सजा कर एक निहायत उम्दा ग़ज़ल लिखी है।

राज भाटिय़ा August 10, 2010 at 10:59 AM  

बहुत सुंदर ओर उम्दा रचना.धन्यवाद

संगीता स्वरुप ( गीत ) August 10, 2010 at 12:04 PM  

सत्य को कहती उम्दा गज़ल ..

Rajendra Swarnkar August 10, 2010 at 12:37 PM  

गिरीश पंकज जी
अच्छे लोगों के मन पीड़ा को स्वर देने वाले अश्आर के लिए शुक्रिया !
यहां-वहां अब छाये दिखते सारे तथाकथित
भरे हुए हैं सत्ता के गलियारे तथाकथित


मुझ तक आने से पहले उजियारे लुप्त हुए
भेजे थे चन्दा ने हमको तारे तथाकथित

अंतर्निहित इशारे बहुत कुछ कह रहे हैं …

अच्छी रचना !
बधाई !

- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

Rahul Singh August 10, 2010 at 7:20 PM  

''चार लोग' क्‍या कहेंगे' पर किसी की पुरानी उक्ति है, 'मैं उन चार लोगों की तलाश में हूं, मिल जाएं तो सारी समस्‍या एक साथ ही निपटा दूं' आपकी रचना पढ़कर लगा कि वे 'चार' आजकल एक में समाहित होकर 'तथाकथित' बन गए हैं. बधाई.

ललित शर्मा August 10, 2010 at 8:07 PM  

उम्दा पोस्ट के लिए धन्यवाद


ब्लॉग4वार्ता की 150वीं पोस्ट पर आपका स्वागत है

Udan Tashtari August 10, 2010 at 8:12 PM  

बेहतरीन!

नीरज गोस्वामी August 10, 2010 at 11:02 PM  

गिरीश जी कमाल किया है आपने...अनूठा रदीफ़ प्रस्तुत किया है और निभाया भी खूब है...
नीरज

शहरोज़ August 10, 2010 at 11:33 PM  

भैया आप निसदेह जनकवि हैं.आपकी गजलों और गीतों पर अलग से लिखने की ज़रुरत समझता हूँ.बस समय ने साथ दिया .यूँ तो यह ग़ज़ल मुकम्मल है.लेकिन यह शेर ख़ास ध्यान खींचते हैं.
यहां-वहां अब छाये दिखते सारे तथाकथित
भरे हुए हैं सत्ता के गलियारे तथाकथित

मुझ तक आने से पहले उजियारे लुप्त हुए
भेजे थे चन्दा ने हमको तारे तथाकथित

आग्रह है कि इस पोस्ट को अवश्य पढ़ें:और जो भी आपकी राय हो यहाँ व्यक्त करें.
शमा -ए -हरम हो या दिया सोमनाथ का
http://saajha-sarokaar.blogspot.com/2010/08/blog-post.html

arvind August 11, 2010 at 1:51 AM  

बहुत दिनों तक खून के आँसू रोई सच्चाई
आखिर इक दिन वही हुआ कि हारे तथाकथित .....बेहतरीन!

वन्दना August 11, 2010 at 3:21 AM  

्सुन्दर अभिव्यक्ति।

निर्मला कपिला August 11, 2010 at 9:13 AM  

लाजवाब गज़ल। शुभकामनायें

परमजीत सिँह बाली August 11, 2010 at 12:45 PM  

उम्दा रचना..बधाई.

डा.सुभाष राय August 11, 2010 at 7:48 PM  

गिरीश भाई बहुत अच्छी गजल. आप ने विष्णु खरे को जैसी लताड़ लगायी है, उसका संकेत इस गजल में देख रहा हूं. इस मामले पर हम सबको एकजुट होकर प्रहार करने की जरूरत है.

S.M.HABIB August 12, 2010 at 9:51 AM  

भईया ग़ज़ल के हर शेर में जाने कितने इशारे गुम्फित कर दिए हैं. प्रणाम और बधाई.

Anonymous August 13, 2010 at 4:43 AM  

Nice dispatch and this enter helped me alot in my college assignement. Thank you seeking your information.

Sonal August 13, 2010 at 6:32 AM  

हमने तुमको प्यार किया पर तुम तो बदल गए
क्या मालूम था निकलोगे तुम प्यारे तथाकथित
bahut khoob..

Meri Nayi Kavita par aapke Comments ka intzar rahega.....

A Silent Silence : Naani ki sunaai wo kahani..

Banned Area News : Fears of epidemic after mudslide in China

शहरोज़ August 13, 2010 at 7:32 AM  

क्या बात है !! बहुत खूब!

.हम आपके साथ हैं.
समय हो तो अवश्य पढ़ें.

विभाजन की ६३ वीं बरसी पर आर्तनाद :कलश से यूँ गुज़रकर जब अज़ान हैं पुकारती http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_12.html

चिट्ठाप्रहरी टीम August 13, 2010 at 8:25 AM  

पंकज जी आपका जवाब नही ,
अच्छी प्रस्तुती के लिये आपका आभार ।

खुशखबरी

हिन्दी ब्लाँग जगत मे ब्लाँग संकलक चिट्ठाप्रहरी की शुरुआत कि गई है । आप सबसे अनुरोध है कि चिट्ठाप्रहरी मे अपना ब्लाँग जोङकर एक सच्चे प्रहरी बनेँ , यहाँ चटका लगाकर देख सकते हैँ

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ August 13, 2010 at 11:58 PM  

इन तथाकथितों के बहाने आपने बहुत बढिया गजल कह दी, बधाई।
………….
सपनों का भी मतलब होता है?
साहित्यिक चोरी का निर्लज्ज कारनामा.....

सुनिए गिरीश पंकज को

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