जीने का बस एक हुनर देते जाना
मुझको कोई ख़्वाब इधर देते जाना
मुझको कोई ख़्वाब इधर देते जाना
बची रहे ये दुनिया हरदम पापों से
ऊपरवाले का इक डर देते जाना
खूब उड़ानें भर ली है तुमने ऊँची
नन्हें पाखी को भी पर देते जाना
तुमने दुनिया का हर वैभव पाया है
औरों को भी कुछ अवसर देते जाना
इन अंधी आँखों को थोड़ा पता चले
दुनिया की कुछ नई खबर देते जाना
जली-कटी क्यों रोज़ सुनाते हैं साहब
बस थोड़ा-सा मुझे जहर देते जाना
केवल बातों से क्या कोई बात बनी
मुझको बस इसका उत्तर देते जाना
ऊपर वाले तुझसे इतनी विनती है
मुझको मंज़िल नहीं, डगर देते जाना
तुमने मेरी नींद चुराई है पंकज
इक दिन आके दर्शन भर देते जाना
ऊपर वाले तुझसे इतनी विनती है
ReplyDeleteमुझको मंज़िल नहीं, डगर देते जाना
बहुत खूबसूरत गज़ल ...यही जीने का हुनर मिलता रहे ..
नीलकंठ
ऊपर वाले तुझसे इतनी विनती है
ReplyDeleteमुझको मंज़िल नहीं, डगर देते जाना
वाह! क्या बात कही है……………बस यही चाहता है इंसान …………अति सुन्दर ।
बची रहे ये दुनिया हरदम पापों से
ReplyDeleteऊपरवाले का इक डर देते जाना
वाह! क्या बात है.......
वाह! बेहतरीन ग़ज़ल, हमेशा की तरह!
ReplyDeleteऊपर वाले तुझसे इतनी विनती है
ReplyDeleteमुझको मंज़िल नहीं, डगर देते जाना
बहुत खूबसूरत गज़ल .....
बहुत सुंदर गजल जी, धन्यवाद
ReplyDeleteबची रहे ये दुनिया हरदम पापों से
ReplyDeleteऊपरवाले का इक डर देते जाना
काश बस एक यही डर हो इंसान में.
बहुत सुन्दर गज़ल.
ऊपर वाले तुझसे इतनी विनती है
ReplyDeleteमुझको मंज़िल नहीं, डगर देते जाना
सत्य है
बची रहे ये दुनिया हरदम पापों से
ReplyDeleteऊपरवाले का इक डर देते जाना
.................बहुत सुन्दर
बची रहे ये दुनिया हरदम पापों से
ReplyDeleteऊपरवाले का इक डर देते जाना
खूब उड़ानें भर ली है तुमने ऊँची
नन्हें पाखी को भी पर देते जाना
क्या खूब ग़ज़ल कही है..बहुत अच्छी...
चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 25-01-2011
ReplyDeleteको ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..
http://charchamanch.uchcharan.com/
क्या खूब ग़ज़ल कही है..बहुत अच्छी..
ReplyDeleteखूब उड़ानें भर ली है तुमने ऊँची
ReplyDeleteनन्हें पाखी को भी पर देते जाना
सुंदर सोच से परिपूर्ण रचना -
बधाई
waah ustad wah
ReplyDeleteजली-कटी क्यों रोज़ सुनाते हैं साहब
ReplyDeleteबस थोड़ा-सा मुझे जहर देते जाना
इन पंक्तियों की तल्ख़ी बहुत खूबसूरती से बयान की गई है । बधाई हो भाई पंकज जी !
खूब उड़ानें भर ली है तुमने ऊँची
ReplyDeleteनन्हें पाखी को भी पर देते जाना..
bahut khoobasoorat gazal..harek sher lazawaab..
बहुत ही सुंदर मार्मिक रचना। आदरणीय पंकज जी को बहुत बहुत बधाई……
ReplyDeleteबहुत खूब...
ReplyDeleteआज आपके ब्लॉग पर पहली मर्तबा आई हूँ... परन्तु लग रहा है की आज तक क्यूं नहीं आई थी... बहुत कुछ सीख जाती...
शुक्रिया इतनी सुन्दर, कई भावों को समेटे इस ग़ज़ल से मुखातिब करवाने के लिए...
केवल बातों से क्या कोई बात बनी
ReplyDeleteमुझको बस इसका उत्तर देते जाना
ऊपर वाले तुझसे इतनी विनती है
मुझको मंज़िल नहीं, डगर देते जाना
bahut sunder!
ऊपर वाले तुझसे इतनी विनती है
ReplyDeleteमुझको मंज़िल नहीं, डगर देते जाना
wah .kya baat hai.
बची रहे ये दुनिया हरदम पापों से
ReplyDeleteऊपरवाले का इक डर देते जाना
वाह, बहुत कीमती बात कही है आपने।
आजकल के लोग किसी और से भले डरते होंगे लेकिन ईश्वर से नहीं डरते।
प्रशंसनीय ग़ज़ल।
खूब उड़ानें भर ली है तुमने ऊँची
ReplyDeleteनन्हें पाखी को भी पर देते जाना....
क्या खूब ग़ज़ल कही है..बहुत अच्छी...उम्दा...।
खूब उड़ानें भर ली है तुमने ऊँची
ReplyDeleteनन्हें पाखी को भी पर देते जाना
चाचा जी, बेहतरीन सुंदर भाव समेटे हुए एक बेहतरीन ग़ज़ल प्रस्तुत की आपने...आपकी ग़ज़लें हो या व्यंग्य आलेख संवेदना से लबरेज होती है| ग़ज़लें तो पढ़ते ही दिल दिमाग़ पर छा जाती है....सार्थक ब्लॉगिंग यही होती है...प्रणाम चाचा जी..