''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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नई ग़ज़ल/ जो कहता है यहाँ पर सच उसी की जान जाती है

>> Monday, August 8, 2011

जो कहता है यहाँ पर सच उसी की जान जाती है
जो हैं झूठे वहां खुशियों की चादर झिलमिलाती है

बड़ी तकलीफ होती है जहां झूठे ही बसते हैं
सच्चाई तो दुबक कर के वहां आंसू बहाती है

ये मेरे लोग ही मुझको पराये-से लगें अब तो
अगर सच बोलता हूँ तो जुबां ये लड़खड़ाती है

अगर इंसान है ऊंचा तो अपना दिल बड़ा कर ले
जहां बौने हों दिल से लोग वह बस्ती सताती है

मैं वैसा मुल्क चाहूंगा जहां सच पे न हों पहरे
अभी तो बंदिशों में आत्मा ही छटपटाती है

कोई तो आये बोले खुल के अपनी बात रख दे तू
यहाँ हर एक कुर्सी रंग सामंती दिखाती है

यहाँ भगवान भी पत्थर से बाहर आ नहीं पाता
उसी के सामने इज्ज़त कोई अपनी गंवाती है

ज़रा सोचो न इतराओ चलो इनसान बन जाओ
अरे यह चार दिन की ज़िंदगी कब लौट पाती है

न जाने कब सुगन्धित दौर आएगा यहाँ पंकज
अभी तो हर तरफ नाली यहाँ पर बजबजाती है

11 टिप्पणियाँ:

Dr Varsha Singh August 8, 2011 at 7:36 AM  

जो कहता है यहाँ पर सच उसी की जान जाती है
जो हैं झूठे वहां खुशियों की चादर झिलमिलाती है


मतला तो बहुत ही खूबसूरत है!
बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बहुत-बहुत बधाई स्वीकार करें ।

कुश्वंश August 8, 2011 at 8:16 AM  

मैं वैसा मुल्क चाहूंगा जहां सच पे न हों पहरे
अभी तो बंदिशों में आत्मा ही छटपटाती है

बेहतरीन शेरो का पिटारा , गिरीश जी बेमिशाल. एक व्यक्तिगत अनुनय मुझे आपकी सहितियक कृतियाँ अपने संकलन में चाहिए कहाँ संपर्क करूं. सादर (कुश्वंश@जीमेल.कॉम)

संगीता स्वरुप ( गीत ) August 8, 2011 at 11:26 AM  

मैं वैसा मुल्क चाहूंगा जहां सच पे न हों पहरे
अभी तो बंदिशों में आत्मा ही छटपटाती है

कोई तो आये बोले खुल के अपनी बात रख दे तू
यहाँ हर एक कुर्सी रंग सामंती दिखाती है

सटीक बात कही है ..अच्छी गज़ल

Vivek Jain August 8, 2011 at 11:34 AM  

बेहतरीन ग़ज़ल
सादर,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

नीरज गोस्वामी August 8, 2011 at 11:26 PM  

यहाँ भगवान भी पत्थर से बाहर आ नहीं पाता
उसी के सामने इज्ज़त कोई अपनी गंवाती है


लाजवाब ग़ज़ल गिरीश जी..बधाई स्वीकारें...

नीरज

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ August 8, 2011 at 11:36 PM  

सही फरमाया

वीना August 9, 2011 at 5:11 AM  

ज़रा सोचो न इतराओ चलो इनसान बन जाओ
अरे यह चार दिन की ज़िंदगी कब लौट पाती है

लाजवाब...

S.M.HABIB August 9, 2011 at 6:19 AM  

ज़रा सोचो न इतराओ चलो इनसान बन जाओ
अरे यह चार दिन की ज़िंदगी कब लौट पाती है

वाह भईया... बहुत सुन्दर ग़ज़ल...
सादर..

सतीश सक्सेना August 9, 2011 at 9:27 AM  

एक एक लाइन पर दिल वाह वाह कह उठता है भाई जी ! शुभकामनायें !

Dr (Miss) Sharad Singh August 10, 2011 at 3:00 AM  

बड़ी तकलीफ होती है जहां झूठे ही बसते हैं
सच्चाई तो दुबक कर के वहां आंसू बहाती है
ये मेरे लोग ही मुझको पराये-से लगें अब तो
अगर सच बोलता हूँ तो जुबां ये लड़खड़ाती है

बहुत खूब...
शानदार ग़ज़ल...

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" August 10, 2011 at 12:13 PM  

मैं वैसा मुल्क चाहूंगा जहां सच पे न हों पहरे
अभी तो बंदिशों में आत्मा ही छटपटाती है

कोई तो आये बोले खुल के अपनी बात रख दे तू
यहाँ हर एक कुर्सी रंग सामंती दिखाती है
aaina bhi dikha diya
dil ka raj bhi bata diya
log rango se deewaron pe chitra banate hain
aapne shabdon se dilon ko hilate hain,,,, behad shandar rachna,, aap jaise kalam ke pujariyon ki inayat agar ham jaise nausikhiyon pe ho jaye to hame margdarshan mile,,,isi akanksha ke sath apne blog pe aane ka amantran de raha hoon

सुनिए गिरीश पंकज को

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