''सद्भावना दर्पण'

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नई ग़ज़ल / हर सिम्त खुल रहे हैं बदन देख रहे हैं

>> Sunday, July 31, 2011

मत पूछिए हम कितना पतन देख रहे हैं
हर सिम्त खुल रहे हैं बदन देख रहे हैं

ये कैसी नयी सभ्यता है कैसा नया दौर?
कम हो रहे लोगों के वसन देख रहे हैं

पहले हजारों लोग मरे देश के लिए
अब उनको खोजता है वतन देख रहे हैं

इंसान हूँ अन्याय को सहने की हद भी है
कब तक के कर सकेंगे सहन देख रहे हैं

अपने कहे से रोज मुकर जाए सियासत 
पल-पल में बदलते हैं कथन देख रहे हैं

रिश्ते न टूट जाएँ वो खुदगर्ज़ हैं बड़े
कोशिश में हमीं कर के जतन देख रहे हैं

विश्वास था माली इसे महकाएगा ज़रूर 
लेकिन यहाँ उजड़ा ये चमन देख रहे हैं

ये 'तंत्र' बड़े प्यार से सौंपा था हमीं ने
उन हाथों में अपने लिए 'गन' देख रहे हैं

हमने जिन्हें उठा के बिठाया था फलक पर
वे हमको दिखाते हैं ठसन देख रहे हैं

सूरज न जाने कब इधर आएगा क्या पता
फिलहाल रात है ये गहन देख रहे हैं

जिसके लिए हम जान लुटाएं, दगा करे
धोखाधड़ी है अब तो चलन देख रहे हैं

पापों का हाल ये है इधर पूछ न पंकज 
पापी ही रोज करते हवन देख रहे हैं

15 टिप्पणियाँ:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ July 31, 2011 at 7:21 AM  

मेरी एक ग़जल का एक मिसरा है- अबके और आदिमों के बीच फ़र्क बेमानी, जिस्म से हट रहे बनियान कहा करते हैं’

आपने सामयिक फूहड़पन पर बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखी है...बहुत-बहुत आभार...आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 01-08-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर सोमवासरीय चर्चा में भी होगी। सूचनार्थ

mahendra verma July 31, 2011 at 8:28 AM  

पहले हजारों लोग मरे देश के लिए
अब उनको खोजता है वतन देख रहे हैं

हक़ीकत बयां हुई है, इस शानदार ग़ज़ल में।

अशोक बजाज July 31, 2011 at 9:51 AM  

विश्वास था माली इसे महकाएगा ज़रूर
लेकिन यहाँ उजड़ा ये चमन देख रहे हैं

देश के आम आदमी की दर्दनांक दास्ताँ की भाव भरी रचना .

Dr Varsha Singh July 31, 2011 at 10:38 AM  

रिश्ते न टूट जाएँ वो खुदगर्ज़ हैं बड़े
कोशिश में हमीं कर के जतन देख रहे हैं

हर शेर उम्दा....एक से बढकर एक......

Dorothy July 31, 2011 at 7:43 PM  

रिश्ते न टूट जाएँ वो खुदगर्ज़ हैं बड़े
कोशिश में हमीं कर के जतन देख रहे हैं

खूबसूरत गजल. आभार.
सादर,
डोरोथी.

S.M.HABIB July 31, 2011 at 8:36 PM  

भैया सादर प्रणाम.
इस बेहतरीन ग़ज़ल पर कुछ कहने को शब्द नहीं....
सादर...

संगीता स्वरुप ( गीत ) July 31, 2011 at 9:53 PM  

आज 01- 08 - 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर

रश्मि प्रभा... August 1, 2011 at 12:27 AM  

इंसान हूँ अन्याय को सहने की हद भी है
कब तक के कर सकेंगे सहन देख रहे हैं


सूरज न जाने कब इधर आएगा क्या पता
फिलहाल रात है ये गहन देख रहे हैं
bemisaal

Rajesh Kumari August 1, 2011 at 12:57 AM  

bahut vicharatmak prastuti.ek laajabab ghazal.

vidhya August 1, 2011 at 3:02 AM  

वाह बहुत ही सुन्दर
रचा है आप ने
क्या कहने ||
लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

Arun Paliwal,Rajsamand August 1, 2011 at 6:36 AM  

बेहतरीन ......

संगीता स्वरुप ( गीत ) August 1, 2011 at 12:24 PM  

ये 'तंत्र' बड़े प्यार से सौंपा था हमीं ने
उन हाथों में अपने लिए 'गन' देख रहे हैं

हमने जिन्हें उठा के बिठाया था फलक पर
वे हमको दिखाते हैं ठसन देख रहे हैं

सटीक बात कहती खूबसूरत गज़ल

वाणी गीत August 2, 2011 at 7:42 PM  

पाप ही रोज करते हवन देख रहे हैं ....
एक एक पंक्ति सत्य का आईना दिखाती है !

Ramesh Sharma August 7, 2011 at 1:54 AM  

ये 'तंत्र' बड़े प्यार से सौंपा था हमीं ने
उन हाथों में अपने लिए 'गन' देख रहे हैं.


वाह !! आईना देख रहे हैं...

डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee September 12, 2011 at 8:54 AM  

आपकी ग़ज़ल पर मेरी दो पंक्तियाँ सादर -

"दो-चार क्या यहाँ तो गए साठ बरस से ।
सोने गढ़ी चिड़िया का गबन देख रहे हैं॥ "

सुनिए गिरीश पंकज को

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