''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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जैसे किया सवाल देखिये / सत्ता में भूचाल देखिये

>> Sunday, June 2, 2013

कविता लम्बी तो है, मगर शायद पसंद आ जाये
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जैसे किया सवाल देखिये / सत्ता में  भूचाल देखिये
क्या सोचा था क्या पाया है / लोकतंत्र का हाल देखिये
सच कहना भारी पड़ता है /कितना मचा बवाल देखिये
समझाइश का असर नहीं है / कितनी मोटी खाल देखिये
उनका 'स्वीमिंग पूल' लबालब/ अपने सूखा ताल देखिये
जिसको मौका मिला वही अब / लूट रहा है माल देखिये
शायद फिर मछली फँस जाये / फेंक रहे वे जाल देखिये
आँखें मूँदो, फिकर मत करो / है ये नया ख़याल देखिये
अपनी भी है शाही थाली  / सूखी रोटी-दाल देखिये
जीवन को हँस कर हम जीएँ / वरना है जंजाल देखिये
फिर वो  मालामाल हो गये / फिर से पडा अकाल देखिये
सच्चाई के साथ जिया वो / बेचारा- बदहाल देखिये
देस छोड़ परदेस जा बसे / थे माई के लाल देखिये
खुद तो मालामाल हो गए / देश हुआ कंगाल देखिये
भ्रष्टोदय जी रिश्वत दे कर / फिर से हुए बहाल देखिये
हमने पूछा कुछ आता है? / बजा रहे हैं  गाल देखिये
आओ, सुख तक हम पहुंचा दें?  फिरते यहाँ दलाल देखिये
वो कितना संतोषी बन्दा / है कितना खुशहाल देखिये
भूखे रह कर भी मुस्काए/ 'पंकज' करे कमाल देखिये 

6 टिप्पणियाँ:

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) June 3, 2013 at 8:42 AM  

गिरीश जी की कविता को पसंद करने में "शायद" का प्रयोग हो ही नहीं सकता. सटीक कविता आदरणीय.

Rajesh Kumari June 3, 2013 at 9:34 AM  

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार ४ /६/१३ को चर्चामंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आप का वहां हार्दिक स्वागत है ।

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया June 3, 2013 at 11:31 AM  

इतना सब कुछ होने पर / नेताओं के क्या है ख्याल देखिये,

recent post : ऐसी गजल गाता नही,

पूरण खण्डेलवाल June 3, 2013 at 8:08 PM  

सटीक रचना !!

Prakash Jain June 4, 2013 at 5:00 AM  

Saral magar teekha aur satik vyang..

Ye panktiyan yaad aati hai yahan:

bas ek hi ullu kaafi tha barbaad gulishtaan karneko,
har saakh pe ullu baitha hai, anjaame gulishtaan kya hoga...

vandana July 2, 2013 at 5:37 PM  

अपनी भी है शाही थाली / सूखी रोटी-दाल देखिये

बेहतरीन व्यंग्य

सुनिए गिरीश पंकज को

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