''सद्भावना दर्पण'

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&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.

उमंग और आस्था का एक और गीत

>> Thursday, December 11, 2014

ये हसीन प्रात है, ये हसीन प्रात है।
हो न कोई साथ किन्तु प्रकृति का साथ है।

पक्षियों का गान है / पेड़ गुनगुना रहे.
नाचती है ये नदी,/ फूल खिलखिला रहे।
हर तरफ उमंग / इक नयी तरंग है
ज़िंदगी में आज कुछ / इक नयी-सी बात है।
ये हसीन प्रात है, ये हसीन प्रात है।... .

रात जो गयी उसे. भूलना पड़ा सदा
सामने है लक्ष्य तो/ तू कदम बढ़ा सदा
ज़िंदगी भी जंग है / हौसला भी संग है
इसलिए चले -चलो / दुश्मनों की मात है।
ये हसीन प्रात है, ये हसीन प्रात है।. .

खेत ये बचे रहें / ग्राम का विकास हो.
गाय घर बंधी रहे/ दूध-घी की आस हो।
गाँव से ही रंग है / हर नदी ही गंग है.
शुद्ध ये हवा रहे / तो बलिष्ठ गात है.
ये हसीन प्रात है, ये हसीन प्रात है।.

1 टिप्पणियाँ:

Kavita Rawat December 11, 2014 at 6:33 AM  

सुन्दर संकल्प गीत ..

सुनिए गिरीश पंकज को

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