''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.

हम बच्चे स्कूल चले ...

>> Monday, December 22, 2014


आस्था का गीत
 (खास पेशावर के बच्चो के लिए)

हम बच्चे स्कूल चले ...

काम नेक हम करने वाले
अपनी राह पे चलने वाले
हिम्मत हो तो आये गोली
नहीं कभी हम डरने वाले
वीर-धीर माता है अपनी
उस गोदी में बढ़े- पले.
हम बच्चे स्कूल चले


आने वाला कल अपना है,
गीत मोहब्बत का जपना है।
दुनिया हमको ही गढ़नी है
अपना ये सुन्दर सपना है।
कभी नहीं हम रुकने वाले,
रोको रस्ते लाख भले..
हम बच्चे स्कूल चले।

दुनिया को बांटेंगे प्यार,
यही वक्त की एक पुकार। ,
हिंसा से कब भला हुआ है,
प्रेम हमारा है उपहार।
ईशवर-अल्ला एक हमारे,
रहे प्रेम के वृक्ष तले.

हम बच्चे स्कूल चले।

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1 टिप्पणियाँ:

पुरानी बस्ती December 23, 2014 at 12:40 AM  

क्या पाया तुमने,
ए कत्ले आम करके,
क्या ​अब
भी सोचते हो,
जन्नत पाओगे मरने के बाद,
​गलत सोचते हो तुम,
अब जहन्नुम मे
ढकेल दिए जाओगे,

सुनिए गिरीश पंकज को

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