''सद्भावना दर्पण'

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व्यंग्य / झांसे का दूसरा नाम बजट

>> Tuesday, March 1, 2016

झांसे का दूसरा नाम बजट
गिरीश पंकज 
वित्त मंत्री उस जीव को कहते हैं जो अपने चित्त से बजट पेश करके जनता को चित कर देता है. जिसके कारण जनता पित्त रोग से परेशान हो जाती है. शरीर को खुजाने लगती है. 
देश की जनता महंगाई  नामक डायन से पहले से ही डरी होती है, पर जैसे ही बजट पेश करने का दिन आता है, वह समझ जाती है कि वित्तमंत्री देश के लोगो से पिछले जन्म का कोई  बदला भुनाएगा। और वित्त मंत्री मुस्कराते हुए बजट पेश करता है.  जनता पानी पी-पी कर उसे कोसती है. 
पिछले दिनों वित्त मंत्री मिल ही  गए, सपने में. वैसे तो मिलने से रहे. जिनके पास भरी-भरकम वित्त होता है, वही वित्त मंत्री से मिल सकता है. 
खैर, सपने में मुलाकात हो गई।  हमने कहा- ''ई का तमाशा है।  बजट है या झांसा है?'' 
वित्तमंत्री हँसे और बोले- ''ऐसा है भोले, बर्फ के गोले, झाँसे का दूसरा नाम ही बजट होता है. बजट में हम ऊंची -ऊंची फेंकते है, जिसे लपेट पाना मुश्किल हो जाता है. जैसे हम कहेंगे 'पांच साल बाद महंगाई ख़त्म', 'किसानो की आय दोगुनी हो जाएगी', 'देश का कालाधन वापस आ जाएगा'। बस, देश की जनता कर का भार अपने करों से उठा ले. जनता को लगता है वित्त मंत्री कह रहा है तो ठीक ही कह रहा होगा. बेचारी चुप कर जाती हैं, हम उसके गम को गलत करने बीड़ी से कर हटा लेते हैं. सोने-चांदी पर बढ़ा देते हैं।  जनता को दुःख भरी जिंदगी से मुक्ति हम जहर को कर मुक्त कर देते हैं.'' 
हमने कहा- ''आपने तो कहा था, हमारी सरकार आएगी तो अच्छे दिन आएंगे? क्या हुआ तेरा वादा?'' 
मेरी बात सुन कर वित्त मंत्री फुसफुसी हँसे - ''भाई, मेरे अपने वादे पर सरकार कायम है. अच्छे दिन आकर रहेंगे. हमसे बच कर वे जाएंगे कहाँ? पहले हम लोगों के अच्छे दिन तो आने दो. हमारे सांसद  हैं, बड़े -बड़े नेता है, उनके बाल-बच्चे हैं. उनके अच्छे दिन आ जाएं, फिर आम लोगों के लिए भी कुछ करेंगे। हम नहीं कर सके, तो अगली सरकार करेगी। अगर वो न कर सकी तो हम उसे चैन से जीने नहीं देंगे। जैसे अभी विपक्ष वाले हमारे साथ कर रहे हैं.''
वित्त मंत्री के उत्तर पर बड़ा गुस्सा आया।  हमने एक पत्थर उठा लिया। मंत्री नहीं, अपना सर फोड़ने के लिए. मगर मंत्री घबरा गया. भाग खड़ा हुआ।  
हम उसके पीछे दौड़े कि '' भाई मेरे, हम अपना सर फोड़ना चाहते हैं और यह शुभकार्य आपके हाथो से हो तो अतिउत्तम। '' 
वित्त मंत्री बोले- ''हम सब समझते हैं  कि हमारे साथ का -का हुई सकत है।  टाटा -टाटा, बाय-बाय.'' 
नींद खुली तो देखा सामने गृहमंत्री जी खड़े हैं.यानी हमारी पत्नी। वो बोली - ''सपने में बजट -बजट क्या बड़बड़ा रहे थे. घर के बजट की चिंता करो. अब रोज एक रोटी कम करो. खाने में शामिल गम करो। पगले, इस देश में बजट गरीबो को नहीं, अमीरो को ध्यान में रख कर बनता है क्योंकि देश को अमीर बनाना है.'' 
मुझे लगा पत्नी कितनी समझदार है. इसे तो वित्तमंत्री होना चाहिए था। लेकिन मैंने उसकी तारीफ़ नहीं की वरना वह दिल्ली तक दौड़ जाती।  
मैंने कहा- ''भगवान, तुम ठीक कहती हो, आज से गम ही खाएंगे. लेकिन पहले चाय तो पी लें। '' 
पत्नी  बोली-''पानी उबाल कर ला रही हूँ. उसे ही चाय समझ कर पी लो.दूध, शककर, चायपत्ती का खर्च बचेगा और भविष्य की समस्याओं से जूझने के लिए सेहत भी ठीक रहेगी।''  
मैं सोचने लगा, पत्नी तो स्वास्थ्य मंत्री भी बन सकती है. पर मैंने कहा नहीं, वरना वह खेल मंत्री बन कर मुझे बोल्ड भी कर सकती थी.

2 टिप्पणियाँ:

Digvijay Agrawal March 1, 2016 at 10:28 PM  

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 03 मार्च 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Kavita Rawat March 2, 2016 at 6:09 AM  

रोचक प्रस्तुति ..
उनके तो अच्छे दिन आ ही गए?1

सुनिए गिरीश पंकज को

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