''सद्भावना दर्पण'

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ग़ज़ल/ सरकार के हाथ तलवार

>> Thursday, June 22, 2023

 हाथ में जिसके यहाँ सरकार देखेंगे

जान लो के हाथ में तलवार देखेंगे


बात करते हैं मसीहा लोकतन्त्तर की

और पीछे खड्ग में कुछ धार देखेंगे


सह नहीं सकते कभी निंदा स्वयं  की वे

ये सियासी हैं महज जयकार देखेंगे


उस बार धोखे में तुम्हारे आ गए थे हम

क्या हमें करना है अब इस बार देखेंगे


याचकों जैसे कभी जो लोग आते थे

बाद में अकसर उन्हें मक्कार देखेंगे


हर तरफ धोखाधड़ी दिखती सियासत में

जाने कब सज्जन यहाँ दो-चार देखेंगे


कुछ अंधेरा देखकर पंकज करेंगे शोर

हम जलाएँ दीप जब अंधियार देखेंगे


@ गिरीश पंकज


9 टिप्पणियाँ:

Sweta sinha June 22, 2023 at 9:13 AM  

सराहनीय अभिव्यक्ति सर।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २३ जून २०२३ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

विभा रानी श्रीवास्तव June 22, 2023 at 5:48 PM  

हम जलाएँ दीप जब अंधियार देखेंगे
वाह
बहुत बढ़िया

Arun sathi June 22, 2023 at 10:11 PM  

सेटिंग सही नहीं है कविता की, सुधार की जरुरत है

अच्छी रचना







Onkar June 22, 2023 at 11:17 PM  

बहुत सुंदर

संगीता स्वरुप ( गीत ) June 22, 2023 at 11:47 PM  

सरकार के नाम पर हर बार जुट जाते हैं कुछ मदारी , जनता बन्दर बनी उनकी डुगडुगी पर बस उछल कूद करती रह जाती है ।
होता बस इतना है कि कभी कोई पार्टी तो कभी दूसरी पार्टी सरकार बना लेती है ।
और जनता सोचती है कि किसी एक पार्टी को हरा कर बहुत तीर मार लिया ।
मारक ग़ज़ल

शुभा June 22, 2023 at 11:56 PM  

बहुत खूब!

सुशील कुमार जोशी June 23, 2023 at 12:07 AM  

सटीक

अनीता सैनी June 23, 2023 at 3:16 AM  

बहुत सुंदर सृजन।

girish pankaj June 25, 2023 at 1:23 AM  

सबका आभार

सुनिए गिरीश पंकज को

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