गिरीश पंकज
व्यंग्यकार की कविताई और व्यंग्यादि
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गीत/ गिरीश पंकज
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Sunday, August 16, 2015
आज़ादी का मतलब ये है जन-जन को अधिकार मिले
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आज़ादी का मतलब ये है जन-जन को अधिकार मिले और यहाँ जो कुर्सी पर है उसका सबको प्यार मिले. मगर यहाँ तो रीत है उल्टी सच पर सौ-सौ पहरे हैं किस न्...
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Friday, March 9, 2012
गीत / संघर्षों में जो निखरी,वो औरत है.........
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संघर्षों में जो निखरी,वो औरत है खुशबू बनके जो बिखरी, वो औरत है.. कब तक कोई रोक सका है बहता जल वह तो आगे बढ़ता है केवल कल-कल औरत भी निर...
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Friday, April 29, 2011
गीत / औरत ने औरत को मारा, इसे भूल ना पाऊँगी..
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अरे...? दस दिन बीत गए, कोई रचना पोस्ट नहीं कर पाया. कई बार ऐसे हालात बन जाते हैं,कि चाहते हुए भी ब्लॉग-'लेखन' या ''देखन'...
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