''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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आज़ादी का मतलब ये है जन-जन को अधिकार मिले

>> Sunday, August 16, 2015

आज़ादी का मतलब ये है जन-जन को अधिकार मिले
और यहाँ जो कुर्सी पर है उसका सबको प्यार मिले.

मगर यहाँ तो रीत है उल्टी सच पर सौ-सौ पहरे हैं
किस न्यायलय में जाएं हम जख्म हमारे गहरे हैं .
जिनको अपना दर्द बताओ, अनदेखा कर देता है.
और हमारे अंतर्मन को पीड़ा से भर देता है.
कैसा लोकतंत्र है अपना पीड़ा ही हर बार मिले?
आज़ादी का मतलब ये है जन-जन को अधिकार मिले..

घोटालो से लिप्त हो गए नेता, अफसर, व्यापारी,
तीनो का गठजोड़ हो गया, इसीलिये आफत भारी.
पुलिस बेचारी दासी है वो केवल कहना मान रही
आज़ादी से पहले जैसे लाठी-गोली तान रही.
सड़को पर उतरे गर जनता मतलब वह अपराधी है
इसीलिये अब जुल्म बढ़ गया जनता सीधीसादी है .
जिनको हम चुनते क्यों उनसे अपमानित व्यवहार मिले.
आज़ादी का मतलब ये है जन-जन को अधिकार मिले..

बद से बदतर लोकतंत्र है इसका मरना बाकी है
जो दोषी हैं उनके तन पर खादी है या खाकी है .
घर बैठो , आराम करो, तुम जुल्म सहो तो अच्छा है.
नीली फिल्मे, टीवी देखो मौन रहो तो अच्छा है .
चुटकुल्लों की बाढ़ आ गयी, कवि मानो दरबारी है .
सच्ची कविता हिन्दी जैसी भारत में बेचारी है.
जाने कब हो रामराज कब देश हमें गुलजार मिले.

आज़ादी का मतलब ये है जन-जन को अधिकार मिले
और यहाँ जो कुर्सी पर है उसका सबको प्यार मिले.

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गीत / संघर्षों में जो निखरी,वो औरत है.........

>> Friday, March 9, 2012

संघर्षों में जो निखरी,वो औरत है
खुशबू बनके जो बिखरी, वो औरत है..

कब तक कोई रोक सका है बहता जल

वह तो आगे बढ़ता है केवल कल-कल
औरत भी निर्मल जल, गंगाधारा है.
जिस के बल पर टिका जगत ये सारा है.
आगे बढ़ के ना ठहरी, वो औरत है ..
संघर्षों में जो निखरी,वो औरत है..

कल था उसका, आज और कल भी सुन्दर

साथ उसी के होगी ये दुनिया बेहतर.
यह करुणा का पाठ पढ़ाती रहती है,
जीवन में इक राह दिखाती रहती है.
भीतर-भीतर जो गहरी, वो औरत है..
.संघर्षों में जो निखरी,वो औरत है.......

साथ इसे ले कर के मंजिल को पाना है.

नीलगगन तक इसके संग में जाना  है
शिव-पार्वती-सा जीवन हो जाएगा.
तब जीवन का रस्ता ये कट पाएगा.
सबकी खातिर इक प्रहरी, वो औरत है..

संघर्षों में जो निखरी,वो औरत है

खुशबू बनके जो बिखरी, वो औरत है..

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गीत / औरत ने औरत को मारा, इसे भूल ना पाऊँगी..

>> Friday, April 29, 2011

अरे...? दस दिन बीत गए, कोई रचना पोस्ट नहीं कर पाया. कई बार ऐसे हालात बन जाते हैं,कि चाहते हुए भी ब्लॉग-'लेखन' या ''देखन'' भी नहीं हो पाता. खैर, आज मौका मिला है. इन दिनों कन्या-भ्रूण-ह्त्या पर कुछ-न-कुछ देख-सुन और पढ़ रहा हूँ. लगा, एक गीत बन रहा है. और... बन ही गया. पेश है आपकी सेवा में. अभी इसमें कुछ और काम करना है. फिलहाल मन की बातें लिपिबद्ध हो जाएँ, इसलिए लिख रहा हूँ. इसे बाद में और निखारना है. आपके सुझाव आमंत्रित है. बातें की और क्या-क्या मुद्दे हो सकते हैं...फिलहाल गीत देखें और अपनी शुभकामनाएँ दें  ..

मैं जन्म नहीं ले पाई लेकिन,
कल दोबारा आऊँगी.
कितना कुछ मै कर सकती थी,
तुमको मै बतलाऊंगी...

अगर जन्म हो जाता मेरा, 
दुनिया को महकाती मैं,
रानी बिटिया बन कर इक दिन,
सबकी शान बढ़ाती मैं.
अब हूँ मैं इक ''मुक्कड़'' में- (मुक्कड़-कचरापेटी)
कैसे इतिहास बनाऊँगी.
मैं जन्म नहीं ले पाई लेकिन,
कल दोबारा आऊँगी.....

आ जाती गर दुनिया में तो,
लक्ष्मीबाई-सी बनती.
वीरप्रसूता इस धरती में,
मैं भी वीरों को जनती.
औरत ने औरत को मारा,
इसे भूल ना पाऊँगी..
मैं जन्म नहीं ले पाई लेकिन,
कल दोबारा आऊँगी....

लड़का-लड़की एक बराबर,
जिसने यह स्वीकारा है,
उसको बारम्बार नमन है,
वही चमकता तारा है.
माँ ही मेरी दुश्मन क्यों थी,
प्रभु को क्या समझाऊँगी..
मैं जन्म नहीं ले पाई लेकिन,
कल दोबारा आऊँगी.....

बहुत हो गया पाप धरा पर,
बंद करो यह अत्याचार.
जैसे कटती गऊ माताएं,
वैसे मैं कटती लाचार.
बोझ न समझो मुझे, वक़्त पर-
तेरी शान बढ़ाऊंगी.

मैं जन्म नहीं ले पाई लेकिन,
कल दोबारा आऊँगी.
कितना कुछ मै कर सकती थी,
तुमको मै बतलाऊंगी...

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सुनिए गिरीश पंकज को

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