गिरीश पंकज
व्यंग्यकार की कविताई और व्यंग्यादि
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सवक्तव्य- ग़ज़ल
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सवक्तव्य- ग़ज़ल
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Sunday, April 1, 2012
सबके रेट बढ़ा रहे, दिल्ली के शैतान......
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एक समय था जब देश देश की तरह चला करता था. अब तो लगता है देश किसी बड़े सेठ की दूकान है, जो अपने लाभ की ही चिंता में लगा रहता है. दुःख होता है...
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Wednesday, March 23, 2011
ग़ज़ल/ केवल सर्जक रह जाएँगे, उनको कहाँ मिटाए मौत
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पिछले कुछ सालों अनेक अवसर आये हैं, जब मेरे बेहद प्रिय लोग अकाल मौत मरे. जिनके लिए आँसू बरबस ही बह गए. ये वे लोग थे, जो मेरे सगे नहीं थे, उन्...
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Saturday, October 16, 2010
नई ग़ज़ल/करेगा रावन शासन कब तक?
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दशहरा. . ... इस दिन बुराइयों का प्रतीक रावन मरता है. और भी कुछ असुर मरेंगे. इनको मरना ही चाहिए. समाज की खुशहाली के लिये ज़रूरी है इनकी मौतें...
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