''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.
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सबके रेट बढ़ा रहे, दिल्ली के शैतान......

>> Sunday, April 1, 2012

एक समय था जब देश देश की तरह चला करता था. अब तो लगता है देश किसी बड़े सेठ की दूकान है, जो अपने लाभ की ही चिंता में लगा रहता है. दुःख होता है कि हमारी सरकार को आम नागरिक की बिलकुल चिंता नहीं. महंगाई बढ़ती ही जा रही है. देश में ऐसे करोड़ों लोग है, जिनको  महंगाई-भत्ता  नहीं मिलता. वे लोग कहाँ जाएँ, क्या करे? खैर, हम कुछ नहीं कर सकते. केवल एक कविता लिख सकते है. या जानते हुए भी की इससे कुछ नहीं हो सकता.
महँगाई से भिड गया, टांका ऐसा यार
जब चाहे उसके लिए, खडी हुई सरकार.

जनता जाये भाड़ में, अब ऐसा है दौर,
दिल्ली छीने जा रही, अब तो मुंह का कौर.


देश देश ना अब रहा, जैसे कोई दुकान,
दिल्ली मानों सेठ है, बेच रही सामान .

घटा सह कर भी अगर, दे राहत सरकार.
जनता करती है सदा, तब उसकी जयकार.

लोकतंत्र का हो गया , कैसा सत्यानाश,
छः दशकों के बाद अब, लगता जैसे लाश.

बिजली हो, पेट्रोल हो, खाने का सामान,
सबके रेट बढ़ा रहे, दिल्ली के शैतान

कैसे अब जीवन जिये , हैरत में इंसान.
दूर बहुत बदलाव है, दुखिया हिन्दुस्तान

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ग़ज़ल/ केवल सर्जक रह जाएँगे, उनको कहाँ मिटाए मौत

>> Wednesday, March 23, 2011

पिछले कुछ सालों अनेक अवसर आये हैं, जब मेरे बेहद प्रिय लोग अकाल मौत मरे. जिनके लिए आँसू बरबस ही बह गए. ये वे लोग थे, जो मेरे सगे नहीं थे, उन्होंने कभी मेरा कोई आर्थिक हित नहीं किया, और न मैंने उन्हें किसी तरह का लाभ पहुँचाया. बस, दिल मिलता था. अचानक किसी की हत्या कर दी गई, को सड़क हादसे का शिकार हो गया. अभी हाल ही में पत्रकार साथी आलोक तोमर का चला जाना भी इसी तरह का हादसा ही था. कुछ दिन पहले मैसूर में रहने वाली ए-जानकी जबरदस्त हृदयाघात के कारन चल बसी. हालांकि वे सत्तर की हो चुकी थी, लेकिन जबदस्त जिजीविषा थी उनमे. इन्होने मुंशी प्रेमचंद की अनेक कहानियों के हिंदी अनुवाद किये थे. मेरा सौभाग्य है कि उन्होंने मेरे व्यंग्य-उपन्यास ''माफिया'' का भी हिदी अनुवाद किया.(जो अभी प्रकाश्य है) जानकीजी को अनुवाद के लिए अगले महीने साहित्य अकादेमी सम्मान भी मिलने वाला था, लेकिन कहा गया है न, ''सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं'', तो आदमी बहुत कुछ सोचता है, और अचानक कूच कर जाता है. मृत्यु के इस कटुसत्य पर खूब लिख गया है. बेहतर लिखा गया है. आज भी लोग लिखते ही रहते है. मेरे मन में भी कुछ उमड़ा.अपने विचार आप तक पहुंचा रहा हूँ-
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सबको इक दिन आए मौत
हमको यह बतलाए मौत

नेक काम कर लो तुम जल्दी
जाने कब आ जाए मौत

दुनिया झूठी मैं हूँ सच्ची
सदियों से समझाए मौत

कौन बचा इसके पंजे से
इक दिन सबको खाए मौत

पद, पैसा ये सारी माया
सबसे ध्यान हटाए मौत

जो इतराया वो पछताया
गीत यही इक गाए मौत

हम तो रहते झूठलोक में
लेकिन सत्य सुनाए मौत

कितनों को यह निगल चुकी है
रोजाना मुसकाए मौत

चलते-फिरते स्वस्थ रहें बस
हमको तभी उठाए मौत

कायर को यह खा जाती है
वीरों से घबराए मौत 

सीना ताने खड़े हुए हैं
हमको नहीं डराए मौत

भले जनों को मार न पाई
बस बैठी पछताए मौत

जो ज्ञानी है वो हँसता है
इतना ना इतराए मौत

हम तो बस तैयार खड़े हैं
आना हो, आ जाए मौत

पंकज सर्जक रह जाएँगे
उनको कहाँ मिटाए मौत

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नई ग़ज़ल/करेगा रावन शासन कब तक?

>> Saturday, October 16, 2010

दशहरा..... इस दिन बुराइयों का प्रतीक रावन मरता है. और भी कुछ असुर मरेंगे. इनको मरना ही चाहिए. समाज की खुशहाली के लिये ज़रूरी है इनकी मौतें. मैं ही क्या, बहुत-से लोग इस बारे में लिखेंगे. पिछले दो दशक से इस मौके पर कुछ न कुछ लिखा है मैंने. कभी गद्य-व्यंग्य, कभी नुक्कड़ नाटक (जैसे पुलिस अत्याचार पर केन्द्रित ''रावण शर्मिंदा है''-१९९६) तो कभी गीत. लिखना मेरा काम है. उससे फर्क कितना पड़ता है, इससे कोई लेना-देना नहीं. केवल लिखना ही मेरा और आप का धर्म है. बदलाव कब आएगा, कहा नहीं जा सकता, लेकिन लिखना चाहिए. आवाज़ उठनी चाहिए. अब तक ज़िंदा है रावन..ज़िंदा है तरह-तरह के असुर. मैं  और आप सब पूछ रहे है कि ये ज़िंदा रहेंगे तो कब तक रहेंगे? कब तक...?

करेगा रावन शासन कब तक?

चलेगा आखिर प्रहसन कब तक?
रहेगा ऊँचा रावन कब तक?

मिल कर मारेंगे रावन को
टूटा-फूटा जीवन कब तक?

जनता अब रावन को मारे
सुनेगी आखिर भाषन कब तक?

राम बेचारा निर्वासित है 
करेगा रावन शासन कब तक?

रावन ऊँचा उठता जाये 
राम का ये बौनापन कब तक? 

जागो-जागो बहुत हो गया 
वर्षों का शव-आसन कब तक?

लूट रहे हैं इज्ज़त सबकी
जीएंगे दुस्शासन कब तक?

नकली उत्सव बहुत हो गए 
जीयें असली जीवन कब तक?

कदम-कदम पर असुर हँस रहे
सुनें पाएंगे क्रंदन कब तक?

आखें हो तो ठीक-ठाक है
पर अंधों को अंजन कब तक?

मुफ़्तखोर ही पैसेवाले 
मेहनतकश ही निर्धन कब तक?

साँप विराजेंगे मंचों पर
और निर्वासित चंदन कब तक?

चलेगा आखिर प्रहसन कब तक?
रहेगा ऊँचा रावन कब तक?

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सुनिए गिरीश पंकज को

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