''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.

नई ग़ज़ल

>> Saturday, August 22, 2009


बेच डाला जिस्म और ईमान रोटी के लिये
क्या से क्या होता गया इन्सान रोटी के लिये
खून के रिश्ते कलंकित हो गए बाज़ार मे
आदमी कितना गिरे भगवान रोटी के लिये
क्या पराये और क्या अपने सभी का कत्ल कर
आदमी अब बन गया शैतान रोटी के लिये
भूख से लाचार लोगो की फसल अब उग रही
दिख रहा बदहाल हिन्दुस्तान रोटी के लिए
ज़िन्दगी के वास्ते रोटी ज़रूरी है मगर
कर रहा इंसान विष का पान रोटी के लिए
था बड़ा खुद्दार लेकिन वक्त कुछ ऐसा पड़ा
कर दिया नीलाम हर सम्मान रोटी के लिए
भूख से कोई मरे तो शर्म तक आती नही
मौन क्यो बैठा है संविधान रोटी के लिए
न्याय और कानून-सत्ता हर तरफ़ बाज़ार है
डगमगाता ही रहा मीजान रोटी के लिए
भूख से पागल हुआ तो जानवर बन कर लिया
आदमी ने आदमी की जान रोटी के लिए
भूख से तो मर गया पंकज मगर वह कह गया
क्यों भला बेचू अरे सम्मान रोटी के लिए।
गिरीश पंकज






6 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari August 23, 2009 at 7:32 AM  

आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में हार्दिक स्वागत है. आपके नियमित लेखन के लिए अनेक शुभकामनाऐं.

एक निवेदन:

कृप्या वर्ड वेरीफीकेशन हटा लें ताकि टिप्पणी देने में सहूलियत हो. मात्र एक निवेदन है बाकि आपकी इच्छा.

वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:

डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?> इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये!!.

योगेश स्वप्न August 23, 2009 at 7:52 AM  

umda rachna ke liye badhai. blog jagat men swagat , shubhkaamnayen.

Amit K Sagar August 23, 2009 at 9:08 AM  

बहुत ही उम्दा...साधुवाद. जारी रहें.
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उल्टा तीर पर पूरे अगस्त भर आज़ादी का जश्न "एक चिट्ठी देश के नाम लिखकर" मनाइए- बस इस अगस्त तक. आपकी चिट्ठी २९ अगस्त ०९ तक हमें आपकी तस्वीर व संक्षिप्त परिचय के साथ भेज दीजिये. [उल्टा तीर] please visit: ultateer.blogspot.com/

परमजीत बाली August 23, 2009 at 10:21 AM  

बहुत अच्छी गज़ल है।बधाई।

विपिन बिहारी गोयल August 23, 2009 at 12:07 PM  

सुंदर गजल है

नारदमुनि August 23, 2009 at 9:55 PM  

gajab bhai.narayan narayan

सुनिए गिरीश पंकज को

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