''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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>> Thursday, September 3, 2009


एक नई ग़ज़ल

  • लड़कियाँ
सुंदर कोमल कली लडकियां
होती अक्सर भली लडकियां
कितना मीठा मन रखती है
ज्यो मिसरी की डली लडकियां
मत बांधो पैरो में बंधन
अन्तरिक्ष को चली लडकियां
पीडाओं को सह लेती है
संघर्षो में पली लडकियां
लड़के जब नाकारा निकले
माँ-बाप को फली लडकियां
गिरी हुई दुनिया दिखलाती
ससुरालो में जली लडकियां
गिरीश पंकज


1 टिप्पणियाँ:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari September 4, 2009 at 9:11 AM  

बहुत सुन्‍दर. अंतिम पंक्तियों में सारा सच मुखरित है. आभार बड़े भाई.

सुनिए गिरीश पंकज को

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