''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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>> Sunday, September 13, 2009


इस बार एक गीत.....
चल-चल ......

पत्थर दिल बस्ती में केवल,नेह-सुमन बिखराता चल
सब हो जायेंगे तेरे,पत्थर खा कर मुस्काता चल

जब तक मानव हैं धरती पर, बुरे यहाँ तो अच्छे भी,
केवल झूठे लोग नही है, कुछ मिलते है सच्चे भी
झूठों का हो बहुमत लेकिन सच की ध्वजा उठता चल
सब हो जायेंगे तेरे,पत्थर खा कर मुस्काता चल

सब करते कर्तव्य यहाँ पर, सबको ना फल मिलता है,
बस धीरज हो मन में तो फिर,प्रश्नों का हल मिलता है
मेहनत ही अपनी पूजा है, अपना धर्म निभाता चल
सब हो जायेंगे तेरे,पत्थर खा कर मुस्काता चल।।

पल-पल में संकट कर के, हमको बहुत छकाते है,
टूट नही पाते है वो सच्चे इन्सान कहाते है
काँटों वाले पर पथ चलने की हिम्मत दिखलाता चल।।


पत्थर दिल बस्ती में केवल नेह-सुमन बिखराता चल,
सब हो जायेंगे तेरे पत्थर खा कर मुस्काता चल

गिरीश पंकज



1 टिप्पणियाँ:

वाणी गीत September 13, 2009 at 7:23 PM  

सुन्दर शब्दों में भरी है आशा ..इस आशावादी दृष्टिकोण को बनाये रखें बहुत शुभकामनायें ..!!

सुनिए गिरीश पंकज को

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