''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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>> Monday, September 21, 2009

दो ग़ज़ले और...
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दूसरों के दर्द से बेजार है
आदमी वह देव का अवतार है
जी रहा है सिर्फ़ जो अपने लिए
आदमी कहना उसे बेकार है
अपनी खुशियाँ जो सभी को बांटता
उसके हिस्से रोज़ ही त्यौहार है
एक बच्चा आ गया जब से इधर
ज़िन्दगी वीरान थी गुलज़ार है
तंग थे ये हाथ पर फैले नही
आदमी वाकई बड़ा खुद्दार है
मौत पर जिसके ज़माना रो पड़े
सच कहू पंकज वही किरदार है
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मुझको सबकी मिली दुआएं
कैसे टिकती यहाँ बलाएँ
तोड़ सकीं न मुझको आंधी
हिम्मत से भागी विपदाएं
प्यार की दौलत कम न होगी
चाहे तो दिन-रात लुटाएं
सत्ता कही झुका न पाई
हम क्या हैं कैसे समझाएं
प्रतिभा को मेरा प्रणाम है
चाहे जितना मुझे झुकाएं
सचमुच हिम्मत वाले है तो
दुश्मन को भी गले लगायें
बाहर कोई भूखा होगा
रोटी खा कर भूल न जायें
निंदा बड़ा रसीला फल है
लेकिन इसको कभी न खाएं
तुम मुसकाओ हम मुसकाएं
पंकज अपना फ़र्ज़ निभाएं

गिरीश पंकज

2 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari September 21, 2009 at 4:22 PM  

जी रहा है सिर्फ़ जो अपने लिए
आदमी कहना उसे बेकार है

भई वाह, बहुत खूब. क्या उम्दा भाव है, आनन्द आ गया. बधाई.

योगेश स्वप्न September 22, 2009 at 7:31 AM  

मौत पर जिसके ज़माना रो पड़े
सच कहू पंकज वही किरदार है

girish ji, jitni tareef karun kam hai, behatareen aur lajawaab gazlen. badhaai sweekaren.

सुनिए गिरीश पंकज को

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