''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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>> Sunday, September 20, 2009


नई ग़ज़ल..

गीता, बाइबिल, गुरुग्रंथ, कुरान हमारी बस्ती में
फ़िर
कैसे पैदा हो गए शैतान हमारी बस्ती मे

खून
से लथ-पथ इनसानों की लाशे देख रहा है वो
क़दम
-क़दम पर शर्मिंदा भगवान हमारी बस्ती मे

मेरा
मज़हब सबसे अच्छा, धर्म मेरा सबसे ऊंचा
इस
पागलपन में जाती है जान हमारी बस्ती मे

प्यार
-मोहब्बत की सब बातें लगती है अफसानो-सी
नफ़रत बाँट रही है अँधा-ज्ञान हमारी बस्ती मे

बम-बंदूकों, तलवारों से धर्म कहाँ -कब फैला है
प्रेम की बोली से जीतो इनसान हमारी बस्ती में

गिरीश पंकज

2 टिप्पणियाँ:

संगीता पुरी September 20, 2009 at 5:29 PM  

बहुत सुंदर रचना .. हम ईद और दुर्गा पूजा एक साथ मना रहें .. क्‍या अंतर हो सकता है अल्‍लाह और भगवान में !!

वाणी गीत September 20, 2009 at 5:45 PM  

बम-बंदूकों, तलवारों से धर्म कहाँ -कब फैला है
प्रेम की बोली से जीतो इनसान हमारी बस्ती में
सांप्रदायिक सौहाद्र की जरुरत को दर्शाती सुन्दर कविता ..!!

सुनिए गिरीश पंकज को

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