''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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दो नई ग़ज़ले

>> Friday, September 18, 2009



ग़ज़ल

सबको थोड़ा-थोड़ा सुख मिल जाता है
इतने से ही यह जीवन चल जाता है
बिना तेल-बाती के हमने देखा है
विश्वासों का दीप सदा जल जाता है
खरा आदमी ही चलता है दूर तलक
खोटा केवल एक बार चल जाता है
देख आईना सूरत को मायूस हो
शाम हुई तो सूरज भी ढल जाता है
धोखा देना फितरत है इंसानों की
रोटी पाकर केवल पशु पल जाता है
ये शुभघडियों का चक्कर छोडो प्यारे
इस चक्कर में काम सदा टल जाता है
खोज रहा हूँ असली कारण क्यो पंकज
जिसको अपना कहते है, छल जाता है

(२)

साथ आओगे तो मुझको हौसला मिल जाएगा
साँस लेने का समझ लो सिलसिला मिल जाएगा
यूँ अकेला भी चलू तो कौन रोकेगा मुझे
तुम रहोगे साथ तो यह रास्ता कट जाएगा
थे बहुत छोटे तो सारे भाई-बंधू एक थे
क्या पता था कि बड़े होंगे तो घर बंट जाएगा
आपके होने का दम जो लोग भरते है यहाँ
आने दो कोई मुसीबत सब पता चल जाएगा
प्यार दे कर जीत लो इस ज़िन्दगी की जंग को
हो कोई दुश्मन तुम्हारे रंग में ढल जाएगा

गिरीश पंकज

1 टिप्पणियाँ:

योगेश स्वप्न September 19, 2009 at 5:33 AM  

खोज रहा हूँ असली कारण क्यो पंकज
जिसको अपना कहते है, छल जाता है

wah donon gazlen nihayat hi khoobsurat, badhaai.

सुनिए गिरीश पंकज को

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