''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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साधो यह हिजडों का गाँव-2

>> Wednesday, October 28, 2009


 महान कान्तिकारी कवि कबीर  की युगांतकारी कवितायेँ हमें आज भी दिशा देती है, प्रेरित करती है, कि आज का कवि उनके जैसा लिख सके. अब तो नयी कविताओं का दौर  है. नयी कविता यानि गद्य- कविता. कविता के तत्व उनमे नहीं होते, हाँ, चिंतन ज़रूर होता है. लेकिन ये चिंतन लोगो कि स्मृतियों में नहीं बस पाते, क्यों कि वे गद्य में होते हैं. छंद-बद्ध होते तो याद राह जाते. मध्ययुगीन कवियों की  रचनाएँ आज भी लोगों को याद है. या फिर वे रचनाएँ जो छंद -बद्ध हैं, (और  उनमें दम भी है. छंद तो बहुतों ने लिखे हैं .) कबीर के दोहे औए उनके पदों का कोई मुकाबला नहीं. उनके जैसा लिखने की कोशिश बहुतों ने की, लेकिन कबीर के पास भी कोई नहीं फटक सका. लेकिन मेरी अपनी सोच है, कि उस परमपरा  को आगे बढ़ने की  कोशिश  होनी चाहिए. कबीर जैसे विद्रोही तेवर कविताओं में बरक़रार रहे. वक्त को यह तो महसूस हो कि वैसे महान कवि अब भले ही नहीं है, उनके चिंतन की लाईन पर चलने वालो लोग तो है. मै इस वक्त कबीर जी को याद कर समकालीन समय कि प्रवृत्तियों पर कुछ पद लिख रहा हूँ. इस तरह के पद कुछ अन्य कवियों ने भी लिखे है. मै भी प्रयास कर रहा हूँ. चिकनी चुपडी बातें करने का कोई मतलब नहीं. दो टूक बातें होनी चाहिए. और वह कविता में हो, छंद में हो तो और बेहतर. मैंने कोशिश कि है. बीच-बीच मेरा क्रम चलता रहेगा.  अन्य कविताओं या रचनाओं कि पोस्टिंग के साथ-साथ व्यंग्य-पद भी जारी रहेंगे. ब्लॉग कि दुनिया में जिस तरह कुछ बेहद बचकाने और अगंभीर किस्म के कुछ लोग नज़र आते है, उनसे तो खैर कोई अपेक्षा ही नहीं करता, लेकिन जो साहित्य के मर्म और गंभीर रचना-कर्म को समझते है, उनसे तो अपेक्षा  करता ही हूँ, कि  वे इन पदों को पढेंगे और संभव हो तो प्रतिक्रिया भी देंगे. 
 
व्यंग्य-पद
(गतांक से आगे..)
(4)
जोड़-तोड़ अब सच्चा फन है।
उसको और नहीं कुछ आता, इसी काम में नंबर वन है।
दरबारी सम्मानित होते, खुद्दारी को कंटकवन है।
कैसा लोकतंत्र है जिसमें, जनता की छाती पर गन है।
बेतुक वाले राज कर रहे, छंद यहाँ निर्वासित मन है।
जो सत्ता के गुण ना गाए, उसका बेमतलब जीवन है ।
(5)
धन पा कर के पशु इतराते।
छोटा समझें निर्धन को वे, खुद को अकसर बड़ा जताते।
लूटा है जनता का पैसा, उसको ही ये शान दिखाते।
दया-दान कुछ भी ना करते, नेताओ पर मगर लुटाते ।
तरह-तरह के चोर यहाँ पर, लेकिन हम कुछ समझ न पाते।
जो जितने ज्यादा सफेद हैं, उतने काले काम कराते।
(6)
साधो जात-धरम का चक्कर।
मूरख बन जाते हैं अकसर, इस चक्कर में बस घनचक्कर।
ईश्वर ने भेजा था तुमको, पागल केवल मनुज बना कर।
बँट गए जात-पाँत में काहे, सोचो इस पर थोड़ा रुक कर।
मैं-मैं करके बकरी हो गए, जीयो मत तुम इक पशु बन कर।
सब जातों  को गले लगाओ, तो फिर जीवन जैसे शक्कर।
(7)
हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई।
सभी जगह है ज्ञान के अंधे, कैसे रस्ता दे दिखलाई।
पूजा-आराधन करते हैं लेकिन उनके काज कसाई।
रटे हुए कुछ पद हैं सुंदर, जैसे दोहे अरु चौपाई।
लेकिन गोरखधंधे ऐसे, काम न आए कुछ समझाई।
दो कौड़ी की पूजा है गर, अर्जित करते पाप-कमाई। (क्रमशः )

गिरीश पंकज

4 टिप्पणियाँ:

राजीव तनेजा October 28, 2009 at 11:21 AM  

बहुत ही बढिया

ललित शर्मा October 28, 2009 at 1:01 PM  

आज आपके ब्लाग ने नवीन रुप(चोला बदला)धारण किया है,
नवीन वस्त्राभुषण काफ़ी आकर्षक है
आपको शुभकामनाएं

योगेश स्वप्न October 28, 2009 at 5:12 PM  

हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई।
सभी जगह है ज्ञान के अंधे, कैसे रस्ता दे दिखलाई।
पूजा-आराधन करते हैं लेकिन उनके काज कसाई।
रटे हुए कुछ पद हैं सुंदर, जैसे दोहे अरु चौपाई।
लेकिन गोरखधंधे ऐसे, काम न आए कुछ समझाई।
दो कौड़ी की पूजा है गर, अर्जित करते पाप-कमाई। (क्रमशः )

girish ji, bahut sahi disha ANUPAM.

गिरीश पंकज October 28, 2009 at 10:00 PM  

priy lalit bhai, yogeshji, rajiv ji, blog ka chola hi badla hai, charitr nahi. mai chahta hoo,achchhe pathko ko mai apne jeevan ka jo bhi shreshth hai, de jaaoon, kyonki saamaan sau baras ka, pal kee khabar nahee.

सुनिए गिरीश पंकज को

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