''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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दो गज़लें....

>> Thursday, October 8, 2009

(1)

वो है रीफ लेकिन हालात का मारा
झांसे में के मर गया ज़ज्बात का मारा

किस्मत ने छल किया मगर वो शख्स है कमाल
पैरो से काम लेता है अब हाथ का मारा

डरना है झूठ से सदा सच के लिए मरो
घुट-घुट के मर रहा है इसी बात का मारा

सूरज की रोशनी कभी उसको नहीं भाती
बचता है उजालो से सदा रात का मारा

पैदल भी चल रहे है मगर डर रहे है लोग
हर कोई हो गया है फसादात का मारा

वो आदमी है तनहा खुद्दार है पंकज
अब क्या करे कि है वो अपनी जात का मारा

(2)

मै कबिरा, सूर, तुलसी, जायसी, रसखान का वंशज
मै हूँ सदियों से जिंदा इक भले इन्सान का वंशज

मुझे नफ़रत से मत देखो करो तुम प्यार मुझसे भी
मुझे रब साथ रखता है मै हूँ भगवान का वंशज

करो कोई हुनर पैदा तभी तो याद आओगे
वो देखो कल मरा गुमनाम इक धनवान का वंशज

करो इज्ज़त सदा उसकी भले हो जेब से खाली
कभी भी देवता से कम नही है ज्ञान का वंशज

जो सबको बांटता है प्यार जिसके नैन हों नीचे
मगर माथा रखे ऊंचा वही इन्सान का वंशज
गिरीश पंकज


2 टिप्पणियाँ:

नीरज गोस्वामी October 9, 2009 at 4:38 AM  

गिरीश जी दोनों ग़ज़लें लाजवाब हैं...वाह...बधाई ...
नीरज

योगेश स्वप्न October 9, 2009 at 8:28 AM  

girish ji, donon gazlon ki jitni tareef ki jaaye kam hai, khas kar doosri.........wah har sher........lajawaab...........benmisaal.........gazab..........dheron badhai sweekaren.

सुनिए गिरीश पंकज को

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