''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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निशक्तों को समर्पित

>> Friday, October 23, 2009

सलामत है....
आँखे नहीं रही तो क्या गम
अपना हाथ सलामत है
तुम जैसे दिल वालो का भी
जब तक साथ सलामत है

पैर कट गए मगर हौसला
कैसे कट पता बोलो
जब जीवन में जीने का
यह जज्बात सलामत है

नहीं सुन सके, बोल न पाए
इससे फर्क नहीं पड़ता
संकेतों के जरिये देखो
सारी बात सलामत है

हम तो उजियारे की खातिर
निकल पड़े है मंजिल को
हम भी देखेंगे की आखिर
कब तक रात सलामत है

गिरीश  पंकज 

1 टिप्पणियाँ:

Mishra Pankaj October 23, 2009 at 10:12 AM  

sundar kavita!!!

सुनिए गिरीश पंकज को

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