''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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नैन कजरारे हैं उनमे पर हया मिलती नहीं....

>> Tuesday, October 27, 2009

ग़ज़ल.... 

शोर छाया हर कहीं लेकिन सदा मिलती नहीं
प्यार की भरमार है फिर भी वफ़ा मिलती नहीं

खूबसूरत जिस्म है पर स्याह दिल मिलते यहाँ
नैन कजरारे हैं उनमे पर हया मिलती नहीं

पढ़ गए सुन्दर कथाएँ जो लिखी थीं वक्त ने
अब कहाँ से लायें हम कोई कथा मिलती नहीं

है बड़ी दौलत मगर वो शख्स है मुफलिस बड़ा
उस बिचारे को किसी की भी दुआ मिलती नहीं

जी रहे हैं लोग बस्ती में मगर पंकज यहाँ
ज़िन्दगी जीने की इक सच्ची अदा मिलती नहीं

गिरीश पंकज 

3 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा October 27, 2009 at 10:20 AM  

जी रहे हैं लोग बस्ती में मगर पंकज यहाँ
ज़िन्दगी जीने की इक सच्ची अदा मिलती नहीं
बहुत सुंदर गज़ल-आभार

AlbelaKhatri.com October 27, 2009 at 11:17 AM  

गज़ब,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बहुत खूब .....हया मिलती नहीं..................

योगेश स्वप्न October 27, 2009 at 7:54 PM  

wah girish ji, hamesha ki tarah behatareen rachna. badhaai.

सुनिए गिरीश पंकज को

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