''सद्भावना दर्पण'

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गो-भक्तों के लिए एक और गीत...

>> Wednesday, October 14, 2009

गाय हमारी माँ है. वह विश्व माता भी है. उसके बारे में ऐसा लिख कर मै कोई नया रहस्य उद्घाटित नहीं कर रहा. बस गाय की  महिमा को याद करने का एक अवसर निकाल रहा हूँ. दीवाली पर गो-माता की भी पूजा की जाती है. दरअसल गाय पूजनीय ही है. गाय की  तो प्रतिदिन ही पूजा होती है. दीवाली पर विशेष तौर पर की जाती है. दुःख तब होता है जब गाय की पूजा और उसका निरादर दोनों साथ-साथ  चलते है. नादानों को समझाने कि जरूरत है. बहरहाल, गाय  की स्तुति में लिखा मेरा एक गीत गो-भक्तों के लिए-
कोटि-कोटि इस माँ का वंदन, यह धरती की शान है..


हर धेनु ही कामधेनु है, यह तो देवि समान है,
कोटि-कोटि इस माँ का वंदन, यह धरती की शान है..

सबके मंगलमय जीवन में, अंश गाय का रहता है.
सदियों से यह सत्य जगत को, शुभ्र दूध ही कहता है.
जो मन से करता गो-सेवा, वह सच्चा इनसान है..

हैं कितने ही रूप दुग्ध के, मानो अमृतधरा है.
इस धारे के बिना जीव का, होता कहाँ गुजारा है.
बिना दूध के पूत कौन जो बन पाता बलवान है..

गो-वध करने वाले मानव, बहुत बड़े अपराधी हैं,
इनको प्रेरित करने वाले भी समाज की व्याधी हैं.
माँ को काट रहा जो पापी, वह तो इक शैतान है..

वह गोपालक भी है पापी, दूध-मलाई जो खाए,
मगर कामधेनु के हिस्से, कचरा-पोलीथिन लाए.
यह भी वध का एक रूप है, माता का अपमान है..

पशु-धन हो लाचार अगर तो, उसकी सेवा फ़र्ज़ है.
मात-पिता-सा हमको पोसा, उन पर अपना क़र्ज़ है.
अंत समय तक सेवा करने वाली गाय महान है..

मत समझो यह मूक पशु है, इसे समझ है प्यार की.
बहते है इसके भी आँसू, कमी देख व्यवहार की.
गाय सृष्टि के लिए हमेशा, एक महा वरदान है...

हर धेनु ही कामधेनु है, यह तो देवि समान है,
कोटि-कोटि इस माँ का वंदन, यह धरती की शान है..

गिरीश पंकज 

2 टिप्पणियाँ:

अर्शिया October 15, 2009 at 12:04 AM  

सुंदर गीत।
धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
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योगेश स्वप्न October 15, 2009 at 6:57 AM  

kya kahun, nisshabd hun.....anupam rachna ....badhaai........ punah......deepawali aur dhanteras ki hardik shubhkaamnayen ishwar apke hriday ko adhyatm ke deepak ke prakash se prakashit karen.

सुनिए गिरीश पंकज को

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