''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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नवगीत - लोग रहते है जहां पर मुर्दनी छाई हुई है.

>> Sunday, November 8, 2009

छत्तीस साल पहले की बात है......
आज से लगभग छत्तीस साल पहले की बात है. तब मै मनेन्द्रगढ़ (जिला कोरिया) के हाई स्कूल का कमजोर छात्र था. (कमजोर तो खैर आज भी हूँ) तब मैंने साहित्य की दुनिया में प्रवेश करने के नाम पर केवल एक बाल कविता भर लिखी थी. वो भी शालेय पत्रिका वन्यजा के लिए. मेरे साथ गोपाल बुनकर  नामक मेरा मित्र भी पढ़ता था. वह पढाई में बहुत तेज था. इसलिए मै उसके घर जा कर ही पढाई किया करता था. गोपाल जो कुछ भी पढ़ता, उसे याद हो जाता था, लेकिन मेरी हालत आगे पाठ, पीछे सपाट वाली थी. मै सोचता रहता कि गोपाल की याददाश्त इतनी अच्छी कैसे  है? गोपाल  से भी मैं कारण पूछता तो वह केवल मुस्करा देता. उसे भी इसका ठोस कारण पता नही था. मै उसका दीवाना था. गोपाल की एक बड़ी विशेषता यह भी थी कि वह हाई स्कूल में होते हुए ऐसी कवितायेँ किया करता था, जैसी उस वक्त के बड़े-बड़े कवि किया करते थे. मै किशोर था, लेकिन इतना समझ जाता था कि ये गंभीर कविता है. गोपाल ने एक दिन मुझे अपना गीत सुनाया - ''गीत की ये पंक्तियाँ / उस जहां के लिए है /लोग रहते है जहां पर / मुर्दनी छाई हुई है....'' कमजोर याददाश्त के कारण वह पूरा गीत तो याद नहीं रहा, लेकिन ये पंक्तिया मेरे स्मृति -लोक में सुरक्षित रह गयी. अकसर सोचा करता था कि गोपाल की उक्त पंक्तियों को आगे बढ़ कर गीत को पूरा करू, लेकिन चाह कर भी नहीं कर सका. लेकिन आज, अभी..अचानक... छतीस साल बाद...न जाने ऐसा क्या हुआ कि यह गीत पूरा हो गया. ब्लॉग पर बैठे-बैठे गीत बनता चला गया. हालांकि गीत के स्थाई के मुकाबले पूरा गीत बहुत अच्छा तो नहीं बन सका है, लेकिन मै जो चाहता था, वह काम तो हो गया. गीत को पूरा करने की तमन्ना  पूर्ण हो गयी. अपने गाँव-शहर  मनेन्द्रगढ़ कभी जाऊँगा तो गोपाल को सूचित करूंगा कि तुमने जो गीत कभी सुनाया था, उसे मैंने आगे बढ़ाने की कोशिश की है. शायद वह खुश होगा. गोपाल अब साहित्य से दूर हो चुका है. वह कवितायेँ नहीं करता, लेकिन साहित्य के प्रति उसके  मन   में गहरा अनुराग है. सरकारी नौकरी में गोपाल ऐसा फंसा कि मत पूछो. लेकिन वह बहुत खुश होता है कि मै साहित्य की दुनिया जुडा हुआ हूँ. बहरहाल, ''गीत की ये पंक्तियाँ / उस जहां के लिए है /लोग रहते है जहां पर / मुर्दनी छाई हुई है'' को आगे बढ़ाने की मेरी विनम्र कोशिश को देखें...
लोग रहते हैं जहां पर मुर्दनी छाई हुई है.
गीत की ये पंक्तियाँ
उस जहां के लिए है,
लोग रहते है जहां पर
मुर्दनी छाई हुई है... 

मौन रहते है यहाँ पर लोग
बोलो क्या करें?
वे हैं मुर्दे तो उन्हीं के
संग में क्या हम मरें?
बढ़ नहीं सकते हैं पग  में
छुन्छुनी छाई हुई  है..

हो गए चालाक सारे,
बस गए नेपथ्य में.
खोजते संभावनाएं,
हर खयाली कथ्य में.
जो मुखर है देख उनको,
सनसनी छाई हुई है.

सत्य के जो पक्षधर थे,
आज निर्वासित यहाँ.
लड़ रहा हक के लिए जो,
है वही शापित यहाँ.
क्रांति की बस्ती में अब तो,
अनमनी छाई हुई है..

अब अगर हम न उठे तो,
लोग समझेंगे नपुंसक.
हम मरेंगे सर्जना के -
वास्ते, लेकिन अहिंसक.
रहबर तो है मगर अब,
रहजनी छाई हुई है..

गीत की ये पंक्तियाँ
उस जहां के लिए है,
लोग रहते है जहां पर
मुर्दनी छाई हुई है...
गिरीश पंकज 

1 टिप्पणियाँ:

शरद कोकास November 8, 2009 at 6:49 PM  

भई मुझे भी स्कूल के दिन याद आ गये । उस समय ऐसा ही विद्रोह पनपता रहता था .. प्रेम और विद्रोह का द्वन्द्व ..।

सुनिए गिरीश पंकज को

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