''सद्भावना दर्पण'

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साधो हर नेता मधु कोडा.

>> Wednesday, November 4, 2009

झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा की जो डरावनी -सी कहानियां सामने आ रही है, उसे पढ़ कर हैरत नहीं हो रही. वरन लोग यही सोच रहे है कि हमारे नेता आखिर इस देश को कब तक इसी तरह खोखला करते रहेंगे? मधु कौडा एक प्रतीक है, भ्रष्टाचार का. आज़ादी के बाद से ही ऐसे अनेक दो कौडी के कौडा पैदा होते रहे है, जिन्होंने देश को लूटने का ही काम किया. ये दरअसल विदेशी लुटेरे गजनवी के ही वंशज है. गजनवी भी भारत का धन लूट कर ले जाता था. ये नेता भी देश की दौलत स्विस बैंक में जमा कर देते है. दोनों का चरित्र एक ही है. देश में महंगाई बढ़ रही है, इसका कारण केवल  राजनीति ही है. वह बेशर्म हो गयी है.. खुदगर्ज़ हो गयी है. व्यापारियों पर लगाम कस कर तो देखिये. लेकिन ऐसा होता नहीं. अब जनता को जागना चाहिए. सही लोगो का चुनाव उसे करना चाहिये. भले ही वह गरीब हो. उसका सामाजिक जीवन देखे और उसे संसद या विधानसभा तक भेजे. पैसे वाले, या बाहुबली या ऐसे ही जन-गन-मन को भरमाने वाले लोग कब तक देश को चूसते रहेंगे. कब तक...? कब गाँधी का भारत आकर लेगा? यह एक बड़ा प्रश्न है. बहरहाल, मधु कोडा जैसे बेनकाब अपराधी चहरे से विचलित हो कर एक व्यंग्य-गीत उमड़ा, वह सबसे पहले प्रवक्ता के ही सुधी पाठको के सामने पेश है.

 इस बार पद नहीं, एक व्यंग्य-गीत

साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
जिसे मिला वो डट कर खाए, नहीं किसी ने मौका छोडा.
(१)
 नेता मतलब नएलुटेरे,
बैठे है कुर्सी को घेरे.
राजनीति में अपराधी है.
बहुत बड़ी अब ये व्याधी है.
कब तक सोती रहेगी जनता, अब  तो जागे लिए हथोडा ...
साधो  कदम - कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
(२)
राजनीति अब तो धंधा है,
वेश्या से ज्यादा गन्दा है.
अपराधी औ पैसे वाले,
जीत रहे अब ये ही साले.
कोई पूरा देश खा रहा, कोई खाए थोडा-थोडा.
साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
(३)
स्विस बैंक में देश का माल,
और यहाँ जनता कंगाल?
इन्हें जेल में भेजो जल्दी,
कब छूटे दिल्ली की हल्दी?
जनता बेचारी क्या बोले, सबने तो इसका दिल तोडा.
साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
(४)
रोज़ मर रहे अपने बापू,
कहां हैं तेरे सपने बापू?
नाम तेरा लेते पाखंडी.
आज सियासत बन गयी रंडी.
रजधानी में हत्यारे सब, लोकतंत्र है या है फोडा?
साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
(5)
कितने हम नाम गिनाएंगे,
ये सब तो मारे जायेंगे.
कहाँ गए सब अच्छे लोग,
थे त्यागी औ सच्चे लोग.
अच्छे-अच्छे मुंह की खाते, जनता ने इनका दिल तोडा.
साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
(६)
स्विस बैंक से पैसे लाओ,
भारत को खुशहाल बनाओ.
हर दोषी को जेल में डालो,
देश की इज्जत नहीं उछालो.
इन्हें छोड़ दो चौराहे पर, जनता को दे दो बस कोडा..
साधो कदम-कदम पर मिलते, एक नहीं, ढेरो मधु कोडा.
 -गिरीश पंकज 

3 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा November 4, 2009 at 10:19 PM  

रजधानी में हत्यारे सब, लोकतंत्र है या है फोडा?
बिना फ़ोड़ा, फ़ोड़े नही हो्गा ईलाज
अब तो फ़ोड़ा फ़ोड़ना ही है आज
तभी तो बच पाएगा हमारा समाज
बधाई अब प्रारंभ होना चाहिए काज

नीरज गोस्वामी November 4, 2009 at 11:09 PM  

इस विलक्षण रचना के लिए साधुवाद स्वीकार करें गिरीश जी...बहुत ही जबरदस्त कविता...एक दम सच्ची बात कहती..वाह...
नीरज

योगेश स्वप्न November 5, 2009 at 7:11 AM  

wah , kash aisa ho pata, girish ji bahut sahi bindaas likh rahe hain badhaai sweekaren.

सुनिए गिरीश पंकज को

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