''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.

६ दिसंबर..

>> Sunday, December 6, 2009


६ दिसंबर.... 
एक तारीख जो बताती है कि  हम उन्मादी हो कर क्या कुछ नहीं करते. एक ऐसी जगह ध्वस्त कर दी गयी, जो मसजिद नहीं थी. मुस्लमान भी उसे एक ढांचा ही मानते रहे. राम मंदिर बनाना ही था तो मुसलमानों की सहमिति लेकर शायद उस ढाँचे को गिराया जा सकता था. ऐसा नहीं करते तो किसी और जगह राममंदिर बन सकता था. ढाँचे के ही ठीक बगल से भी मंदिर बन जाता तो राम का क्या बिगड़ जाता भाई..? और क्या अल्लाह भी नाराज़ हो जाते..? शायद नहीं. लेकिन हमारे यहाँ धर्म या मज़हब को लेकर बड़े ही जुनूनी लोग है. इंसानियत के लिए नहीं मरेंगे. धर्म के लिए मरने-मरने पर उतारू हो जायेंगे. पूरे शहर या देश को अशांत कर देंगे. लेकिन ऐसे लोग कम है. अभी भी लोग मानवता की पूजा करते है. इंसानियत को धर्म से बड़ा मानते है. खैर लोग क्या करते है, क्या सोचते है, ये और बात है.मै क्या सोचता हूँ, इसे कुछ पंक्तियों के माध्यम से पेश कर रहा हूँ. देखें...
(१)

अल्लाह के लिए न तुम भगवान के लिए
लड़ना है तो लड़ो सदा  इन्सान के लिए
हर धर्म है महान हर मज़हब में बड़प्पन 
लेकिन नहीं है अर्थ कुछ शैतान के लिए

अपना ये घर संवारो मगर ध्यान तुम रखो 
हम वक्त कुछ निकालें इस जहान के लिए 
(२)
सुबह मोहब्बत शाम महब्बत 
अपना तो है काम महब्बत 
हम तो करते हैं दोनों से 
अल्ला हो या राम महब्बत 
(३)
ऐसा कोई जहान मिले 
हर चहरे पर मुस्कान मिले 
काश मिले मंदिर में अल्ला 
मस्जिद में भगवान मिले.
(४)
और लगे हाथ ये दो शेर भी देख लें...


लहलहाती हुई जो फसल देखता हूँ 
इसे मै किसी का फज़ल देखता हूँ 
ये न उर्दू की है और न हिन्दवी की 
ग़ज़ल को मै केवल ग़ज़ल देखता हूँ...

यानी कहीं कोई भेद कि बात ही न हो. लोग क्या कहते-करते है, इसे न देखें, हम केवल अपना काम करें.

 और अंत में... 
गाँधी जी के प्रिय भजन के साथ मै भी यही दुहराना चाहता हूँ कि -
 ईश्वर, अल्ला तेरो नाम 
सबको सन्मति दे भगवान.....

1 टिप्पणियाँ:

योगेश स्वप्न December 6, 2009 at 6:47 AM  

bahut achchi bhavnaon ke sath sabhi rachnayen anupam.

सुनिए गिरीश पंकज को

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