''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.

पिछली रात चाँद देखा तो

>> Friday, December 11, 2009

अपनी प्रकृति से हट कर एक गीत..... गीत बने रहें. नवगीत भी. कूकते रहे कोयल की तरह. छंद लिखने वाले कम हो रहे है. ये बढ़ें.. छंद हमारी परंपरा है, संस्कृति है. इसे बचाए रखना है. इन दिनों गद्य कविताओं का दौर है. यह कुछ आसान भी है. इस लिहाज से, कि अपने भावो को कागज़ पर उतर देना है बस. तुक मिलता है या नहीं, इसकी चिंता नहीं करनी . 'वह घर जाता है ' तो वह गद्य कविता में ''घर जाता है'' लेकिन पद्य में कहेंगे- ''वह जाता है घर'' या , घर जाता है वह.'' . वाक्य में काव्यात्मकता रहेगी. छंबद्ध कविता तुक में होगी. मतलब यह कि बात बेतुकी नहीं होगी. (वैसे ये और बात है कि तुक में भी लोग बेतुकी बातें कर सकते है, और बेतुकी हो कर भी बात तुक वाली हो सकती है.)मैं तो गद्य कवितायेँ भी लिखता हूँ.नए दौर से भी जुड़े रहना ज़रूरी है.न ..यह खुशी कि बात है, कि  इन दिनों नयी कविताएँ लिखने वालों ने छंदबद्ध कवितायेँ लिख कर छंद की परम्परा को सम्मान दिया है. यह सद्भावना है.यह बनी रहे. केवल गद्य कविता  लिखने वाले ही कवि नहीं होते.आधुनिक बोध छंद के साथ भी उतर सकता है. दोनों तरह की कविताओं का स्वागत होना चाहिए. लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि स्मृति के देश में छंद का राज रहता है.  कुछ चिट्ठाकार छंदबद्ध कवितायेँ लिखने  की सार्थक कोशिश करते है. वे बधाई के पात्र है. छंद अभ्यास से ही सधता है. मै कोशिश कर रहा हूँ.  
मैं सुधी पाठकों से पूछता हूँ कि 
उन्हें नयी कविता क्यों अच्छी लगती है?  
या फिर छन्दबद्ध कविता ही क्यों पसंद आती है..?  
बौद्धिक पाठक कुछ कहें, तो अच्छा लगेगा. उस आधार पर भविष्य में लेख भी लिखना चाहूँगा. बहरहाल, देखें. टिप्पणी करे, न करे, पढ़ने की  कोशिश तो करे.
गीत.....................
 पिछली रात चाँद देखा तो....
पिछली रात चाँद देखा तो,
याद तुम्हारी आई.
जब खोजे सुधियों के बक्से,
फिर से तुम मुसकाई.

धूल भरी  तस्वीर पुरानी,
फिर से चमक उठी. 
मंजुल-नैनों की वह ज्योति,
सहसा दमक उठी.
स्मृति नवयवना की भांति,
लेती है अंगडाई...

दूर भये नैनों से लेकिन,
उर से दूर नहीं.
चाह अगर है अंतस में तो,
प्रियतम यहीं-कहीं.
पास हमेशा रहता है वह,
दूर भले परछाई.

विरही मन में आन बसे तुम,
ओ मुसकाते चेहरे.
मिल गए हम-तुम फिर सपनों में,
लगे थे सौ-सौ पहरे.
सूखे मरुथल में दोबारा,
फिर गंगा लहराई. 


पिछली रात चाँद देखा तो,
याद तुम्हारी आयी.
जब खोजे सुधियों के बक्से,
फिर से तुम मुसकाई.

5 टिप्पणियाँ:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ December 11, 2009 at 4:42 AM  

चांद देखेंगे, तो चांद की ही याद आएगी।
सुंदर कविता, बधाई।
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सलीम खान का हृदय परिवर्तन हो चुका है।
नारी मुक्ति, अंध विश्वास, धर्म और विज्ञान।

महेन्द्र मिश्र December 11, 2009 at 7:06 AM  

सुंदर कविता... बधाई...

AlbelaKhatri.com December 11, 2009 at 7:31 AM  

waah ji waah !

anand kara diya

bahut hi badhiya kavita....badhaai !

योगेश स्वप्न December 11, 2009 at 7:33 AM  

bahut sunder geet likha hai pankaj ji,

ek shikayat kar raha hun , kabhi apne ghar se bahar niklo aur bhi log blog par likhte hain kabhi un par bhi nazar dala karo, unki rachnayen bhi padha karo.

दिगम्बर नासवा December 12, 2009 at 1:50 AM  

प्रेम की सुंदर अभिव्यक्ति ........ अच्छी रचना है .........

सुनिए गिरीश पंकज को

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