''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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बूढ़ी आँखें..जवान आँखें...

>> Thursday, December 17, 2009

कल पेंशनर दिवस था.१७ दिसंबर को. रेलवे से सेवानिवृत्त स्टेशन  मास्टर केवीआर शरमा जी ने  मुझ नाचीज़ को अतिथि  बनाकर बुलाया था. संकोच हो रहा था, लेकिन गया. वहां सारे ही बुजर्ग थे. दस ऐसे रेल कर्मियों को सम्मानित किया गया, जिनकी उम्र काफी हो चुकी थी. दो लोग तो अस्सी पार कर चुके थे.ये लोग कार्यक्रम में बैठे ज़रूर थे, अपना सौभाग्य ही मानता हूँ कि इनको शाल-श्री  फल दे कर मैंने सम्मानित किया, लेकिन मैंने महसूस  किया कि ये आँखे कहीं और खोयी हुई थी. न जाने कहाँ. मैंने बहुत-सी बाते कहीं,.सब तो याद नहीं लेकिन लगा कि कविता में अपने मन की बात उतार ही दू. बुजुर्गों पर , उनकी समस्याओं पर खूब लिखा गया है, फिल्मे भी बनी है. मुझे लगता है कि लगातार  लिखा जाना चाहिए. वैसे अब तो स्वार्थी, नालायक, अपराधी किस्म के लड़को की एक पूरी फ़ौज ही तैयार हो चुकी है. उन पर कविता का, कहानी का क्या असर हो सकता है. फिर भी बात कही जानी चाहिए.इसी गरज से  बस बैठ गया हूँ लिखने. देखे... 

बूढ़ी आँखें..जवान आँखें...
बूढ़ी आँखें भी कभी जवान थी
जब इन आखों ने नन्हीं आखो को 
जवान करने का सपना देखा था
ताकि वो अपना कल बांच सके
संवार सके अपना भविष्य 
आज जब वो नन्हीं आखें जवान हो चुकी है,
तो जवान आँखे बूढ़ी और पराई हो गयी  है
जवान आँखों के पास सब कुछ है
नौकरी/ वेतन/कार, बंगला
बस नहीं है तो वो बूढ़ी आँखें 
जिसने उसके भविष्य के लिए अपनी जवानी होम कर दी
बूढ़ी आँखें उदास है
लेकिन संतुष्ट है. कि 
उन्होंने अपना काम किया
रोपा एक पौधा जो अब 
हरिया रहा है
और इसमे भी निकल आयी है नयी कोंपल
जवान आंखों के सामने कल है इसलिए
बूढ़ी आँखों के लिए वक्त नहीं है उसके पास
क्योंकि अभी और बड़ा पैकेज चाहिए
इस कार से भी बड़ी कार की ज़रुरत है.
जवान आँखों के साथ उसकी खूबसूरत बीवी है..
एक नन्हा बच्चा है..
जवान आखों के सामने संघर्ष है. 
बूढ़ी आँखों के पास दुआएं है. 
आशीर्वाद है
जवान आखों का अपना सुख है. 
बूढ़ी आँखों का अपना है..
जर्जर घर है या
वृद्धाश्रम का उदास और सीलन भरा कमरा है 
जहाँ बैठ कर वो आखे 
सोचती रहती है अक्सर कि 
उसका रोपा गया पौधा 
पेड़ बन कर इसी तरह  हरियाता रहे..
बूढ़ी आँखों को पार पाना 
जवान आखों के लिए संभव नहीं

6 टिप्पणियाँ:

अजय कुमार December 17, 2009 at 11:43 PM  

बेहद भावुक , संवेदनशील और आज के समाज को आइना दिखाती रचना

योगेश स्वप्न December 18, 2009 at 5:38 PM  

bahut achchi rachna.

शहरोज़ December 20, 2009 at 2:34 AM  

बहुत ही मार्मिक ! इस विडंबना के लिए हम सब कहीं न कहीं दोषी हैं.
इक शेर मैं जिसे याद रखता हूँ.काश लोग इस पैर अमल करते:

माँ-बाप की खिदमत मैं इसलिए करता हूँ
इस पेड़ का साया भी बच्चों को मिलेगा

संजय भास्कर March 1, 2010 at 12:32 AM  

दिल को छू रही है यह कविता .......... सत्य की बेहद करीब है ..........

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi April 19, 2010 at 11:33 PM  

गिरीश पंकज आपका करता हूँ मैं आभार व्यक्त
आपकी कविताऐँ है यह ज़िंदगी का आइना

है नेहायत ख़ूबसूरत आपका दिलकश ब्लाग
है नुमायाँ जिस से पंकज ज़िंदगी का सोज़ो साज़
अहमद अली बर्की आज़मी
विदेश प्रसारण सेवा
आकाशवाणी,नई दिल्ली

suneel November 5, 2010 at 4:06 AM  

aadarniya pankj jee

aapki ye panktiya "budi aankhe jawan aankhe" ek behad is shandar aur jiwant jewan ki sachhai ko aaina dhika rahi hai ..
par kaash " bhoutik" shuko ke aage koi in "bhawantamak" sukh ko samaj sakhe..
behad samvedansheel kavita hai aapki..is alkh ko jagane ke liye aapko badhi..is ummed se ki wo subha kabhi to aaygee..
thanks
suneel

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