''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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एक ग़ज़ल.......

>> Friday, December 25, 2009

साथ में रहते हुए भी अजनबी बन कर रहे 

ज़िंदगी में ज़िंदगी की इक कमी बन कर रहे

कैसे उनकी निभ सकेगी दो घड़ी भी दोस्तो
हर घड़ी जो बस हमी हैं, बस हमी बन कर रहे

कौन उसको भूल पाया है सदा संसार में
आदमी के बीच में जो आदमी बन कर रहे

एक बच्चा बोलता है तोतली बोली में सुन
काश के यह आदमी मेरी हंसी बन कर रहे

सूख कर बंजर हुए तो कौन आएगा इधर
वो दिलों में राज करता जो नदी बन कर रहे

मज़हबों के नाम पर गर खूँ बहे इनसान का
शर्म है के आदमी यूं मज़हबी बन कर रहे

तेरे पीछे एक दिन बेशक ज़माना आएगा
गर हमेशा तू सभी की इक ख़ुशी बन कर रहे

देवता से कम नहीं लगता हमें वह आदमी
जो अँधेरे के शहर में रोशनी बन कर रहे

उस नदी से रश्क करता है समंदर दोस्तो 
प्यास जो सबकी बुझाए तिश्नगी बन कर रहे (तिश्नगी-प्यास)
  
ज़िंदगी का पाठ ये आंसू सिखाते है हमें 
आदमी तू आँख के अन्दर नमी बन कर रहे


कैसे उसको हम कहेंगे आदमी 'पंकज' यहाँ 
चंद पैसों के लिए जो बस  'डमी' बन कर रहे

7 टिप्पणियाँ:

राजीव तनेजा December 25, 2009 at 9:26 AM  

कौन उसको भूल पाया है सदा संसार में
आदमी के बीच में जो आदमी बन कर रहे...

हर शेर उम्दा...बहुत बढिया गज़ल...
आनंद आ गया जी फुल बटा फुल

Udan Tashtari December 25, 2009 at 9:32 AM  

एक बच्चा बोलता है तोतली बोली में सुन
काश के यह आदमी मेरी हंसी बन कर रहे

-बहुत बढिया

ललित शर्मा December 25, 2009 at 9:50 AM  

उस नदी से रश्क करता है समंदर दोस्तो
प्यास जो सबकी बुझाए तिश्नगी बन कर रहे

प्यास का निरंतर बना रहना भी तरक्की का बायस होता है,
बनी रहे ये प्यास, बने रहे ये पीने वाले, बनी रहे ये मधुशाला
आभार

अबयज़ ख़ान December 25, 2009 at 11:08 AM  

कौन उसको भूल पाया है सदा संसार में
आदमी के बीच में जो आदमी बन कर रहे

ये दो मिसरे तो बहुत बढ़िया हैं... आज मेरे एक बहुत ही अज़ीज़ मेरा साथ छोड़कर इस दुनिया से रुख्सत हो गये.. मैंने उन पर अपने ब्लॉग में एक पोस्ट भी लिखी... काश आपकी ये दो लाइन भी शामिल कर पाता.. उनपर एकदम सटीक बैठती हैं..

http://abyazk.blogspot.com/

अर्कजेश December 25, 2009 at 1:27 PM  

बहुत खूब ।

योगेश स्वप्न December 25, 2009 at 5:31 PM  

anupam rachna.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' December 30, 2009 at 8:07 AM  

तुम हमारे हो न हो पर बात सच्ची है यही
हम जहाँ भी हैं तुम्हारे मित्र ही बन कर रहे..

सुनिए गिरीश पंकज को

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