''सद्भावना दर्पण'

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ग़ज़ल/ अपनी जान जलाते क्यों हो

>> Monday, December 28, 2009


अपनी जान जलाते क्यों हो
लोगों को समझाते क्यों हो 

हृदयहीन बस्ती में जा कर 
अपने शेर सुनाते क्यों हो 

भीतर-भीतर दर्द समेटे 
बाहर तुम मुस्काते क्यों हो 

गूंगी-बहरी कुरसी को तुम 
दर्देदिल बतलाते क्यों हो 


जहां तुम्हारी इज्ज़त न हो
उस दर पे तुम जाते क्यों हो

अगर प्यार सच्चा है तो फिर
इसको सदा छिपाते क्यों हो 

माना के अहसान कर दिया 
हरदम इसे जताते क्यों हो 


दिल से दिल तो ना मिल पाया
केवल हाथ मिलाते क्यों हो 


लोग पढ़ेंगे तेरा लिक्खा
खुद को यूं बहलाते क्यों हो

प्यार नहीं है 'पंकज' से तो
बार-बार यूं आते क्यों हो


6 टिप्पणियाँ:

singhsdm December 29, 2009 at 12:29 AM  

गिरीश जी
बहुत ही सीधे लहजे में कही गयी एक भाव पूर्ण रचना......
ग़ज़ल अच्छी है भाई.!

अल्पना वर्मा December 29, 2009 at 2:13 AM  

बहुत ही सहज सरल शब्दों में आप ने गम्भीर बातें कह दीं.
सभी शेर बहुत अच्छे हैं.

रंजना December 29, 2009 at 4:11 AM  

जहां तुम्हारी इज्ज़त न हो

उस दर पे तुम जाते क्यों हो

WAAH ! WAAH ! WAAH !

BAHUT HI UMDA...SABHI KE SABHI SHER LAJAWAAB !!!

BAHUT HI SUNDAR RACHNA....

समयचक्र December 29, 2009 at 4:38 AM  

ग़ज़ल अच्छी है ...

योगेश स्वप्न December 29, 2009 at 7:42 AM  

gambheerta liye huye behatareen rachna.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' December 30, 2009 at 8:02 AM  

'सलिल' कद्रदां मित्र तुम्हारा
उस बिन गजल सुनते क्यों हो?...

सुनिए गिरीश पंकज को

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