''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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गीत../ मन के सूखे उपवन में....

>> Thursday, January 14, 2010

....आज फिर मन में एक प्रेम-गीत जन्म ले रहा है. प्रेम...कब, कैसे, क्यों, किसी के लिए अचानक जन्म लेने लगाता है, मन को भी पता नहीं चलता. प्रेम से हारा मन किसी का बैरी नहीं हो सकता. इसलिए अगर दुनिया में लोग प्यार में डूबे रहे और ज़िंदगी को खुशहाल बना सकें, तो उन्हें कोशिश करनी चाहिए. प्यारभरी भावना ही दुनिया को बचा सकती है. बशर्ते वह प्यार हो, स्वार्थ नहीं, यहाँ कोई ''हिडेन एजेंडा'' न हो. खैर, लम्बा-चौड़ा वक्तव्य देने की बजाय पेश है मेरा नया प्रेम-गीत. मेरे प्रिय लेखक-पाठक इसे पसंद करेंगे, ऐसा विश्वास तो है.

गीत....

मन के सूखे उपवन में जब,
फूल कोई खिलने लगता है.
अधरों पर मुस्कान लौटती, 
जीवन बस चलने लगाता है.


बहुत ज़रूरी है जीवन में,
अपनेपन का पौधा बोएं.
कभी किसी के संग हँसे तो,
कभी किसी की खातिर रोएँ.
अंतस ऐसा बन जाए तो,
बुझा दीप जलने लगता है...

भीड़ बहुत है कांटें भी हैं,
फिर भी कोई सुमन खिलेगा.
थके नयन के भीतर इक दिन,
कोई सुन्दर दृश्य पलेगा.
अगर नहीं है बान्झ ह्रदय तो,
स्वप्न मधुर पलने लगता है.

जैसे आकुल उर के भीतर,
गीत कोई आ जाता है.
उसी तरह वंचित जीवन में,
मीत कोई आ जाता है.
दुःख का पर्वत नेह-परस पा,
अनायास गलने लगता है. 


मन के सूखे उपवन में जब,
फूल कोई खिलने लगता है.
अधरों पर मुस्कान लौटती, 
जीवन बस चलने लगाता है..


4 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari January 14, 2010 at 3:50 PM  

मन के सूखे उपवन में जब,
फूल कोई खिलने लगता है.
अधरों पर मुस्कान लौटती,
जीवन बस चलने लगाता है..

-बहुत सुन्दर और कोमल गीत..संपूर्ण प्रवाह और उम्दा प्रेम भाब लिए हुए. बधाई.

योगेश स्वप्न January 14, 2010 at 5:21 PM  

जैसे आकुल उर के भीतर,
गीत कोई आ जाता है.
उसी तरह वंचित जीवन में,
मीत कोई आ जाता है.
दुःख का पर्वत नेह-परस पा,
अनायास गलने लगता है.
wah girish ji aapki rachnaon par kurban. badhaai.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari January 15, 2010 at 3:07 AM  

वाह भैया.


कभी किसी की खातिर रोएँ.

दिव्य नर्मदा divya narmada January 20, 2010 at 7:15 AM  

man ko bhaya.

सुनिए गिरीश पंकज को

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