''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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. लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है...

>> Sunday, January 24, 2010


पिछले दिनों दिल्ली प्रवास पर था. चाह कर भी अपने ब्लॉग पर कोई कविता पोस्ट नहीं कर पाया. उत्तरप्रदेश में पिछले दिनों प्रशासन में बठे अधिकारसंपन्न निर्लज्ज अधिकारियों  ने जो कुछ किया, उस पर पूरे देश में ठंडी-सी प्रतिक्रियाएँ  हुई. है.देश में व्यापक प्रतिक्रया  नहीं हुई. जबकि होनी चाहिए थी. कश्न्मीर से कन्याकुमारी तक एक देश है.एक संवेदना है. एक दर्द है. लेकिन अफसोस..बात आयी-गयी हो गयी? शर्म आती है यह दृश्य देखकर. डीआईजी औरत पर डंडे चलाता है, कलेक्टर अदने-से कर्मचारियों पर थप्पड़ बरसाता है.यह है लोकतंत्र? क्या यही है लोकतंत्र..? अगर अपने देश में लोकतंत्र है, तो कायदे से दोनों अफसरों को निलंबित कर दिया जाना चाहिए. नहीं-नहीं..... इनको बर्खास्त करना चाहिए. अरे, कहीं तो हम यह साबित करें, इस देश में जनता का राज है, अफसरों का नहीं. जनता की सरकार है यहाँ. अंगरेजों का ज़माना नहीं है, कि किसी के भी साथ बदसलूकी हो रही है.कलेक्टर लखनऊ की अकड तो देखो...कह रहा था-''मेरे जैसे आदमी को गुस्सा दिलाता है...मुंह में जुबां नहीं है...?'' 'मेरे जैसे आदमी' का क्या मतलब..? तुम कितने बड़े तोपचंद हो..? और तुमको बनाया किसने..? जनतंत्र ने. ही न .? इस लायक किसने बनाया कि तुम कलेक्टर बन सको..? इस समाज ने. मिस्टर कलेक्टर... उस आदमी के पास ज़बान भी है. जब वह बोलता तो तुम परेशानी में पड़ जाते. तुमने उस ग़रीब को जेल भिजवा दिया. टीवी पर छाये रहे. तुमको लग रहा है, तुम हीरो बन गए, लेकिन पूरा देश तुमको जीरो समझ रहा है. दुःख इस बात का है, कि अब जो लोकतंत्र हम देख रहे है, वह बनावटी है, छल से भरा हुआ है. वरना क्या मजाल थी कि जनता पर मतलब लाठी बरसाने वाला अफसर कुर्सी  पर बना रहता. लेकिन जिस देश में राजनीति और प्रशासन मिल कर जनता का दमन करने पर तुले हों, उस देश में ऐसा ही होगा. और अगर देश के लोग नहीं जगे तो उन्हें सज़ा भोगने के लिए, इस तरह पीटने के लिए ही तैयार रहना चाहिए. अगर हमारे देश में वैचारिक नपुंसकता इसी तरह बनी रही तो हो सकता है, कि हम भविष्य में भी इसी तरह का नकली लोकतंत्र झेलने के लिए अभिशप्त रहेंगे. मै इसे लोकतंत्र ही नहीं मानता. लोकतंत्र तो तब है, जब लखनऊ के सरकारी कर्मचारी को थप्पड़ मारने वाले कलेक्टर पर भी  धारा लगे, वह गिरफ्तार हो. हम लोकतंत्र में एक उदाहरण तो पैदा करे..दिखाए देश को, कि ये है लोकतंत्र...देखो,  कलेक्टर को, डीआइजी को हाथ उठाने और डंडे चलाने वाले को भी हम दण्डित करते है. इन विवेकहीन लोगों को अधिकार किसने दे दिया.? ये लोग अभी तक अपने-अपने पदों पर बैठे क्यों है, मेरे लिए तो अचरज इसी बात का है, कि पूरे देश के सरकारी कर्मचारी चुप क्यों है? वे आंदोलित क्यों नहीं है.? क्या इस भीषण ठण्ड में हमारे लोकतंत्र को पाला मार गया है..? शर्मशार हूँ मै. कब इस देश के लोग अपनी ताकत पहचानेंगे, और निरीह लोगो पर वर्दी  का आतंक फैला कर राज करते रहेंगे.? कब तक ..? बहरहाल, यह कवि-मन सिवाय अपनी पीड़ा को अभिव्यक्क्त करने के, और क्या कर सकता है.?बहुत कुछ और लिख सकता हूँ मै, लेकिन लिख कर फायदा क्या..? कौन सुनेगा मेरी पीड़ा..? क्या कोई परिवर्तन होगा.? नई. फिर भी कई बार मै लिखता हूँ, यही सोच कर कि कल लोकतंत्र सचमुच का लोकतंत्र बन जाएगा. अत्याचारी अफसर सरेआम दण्डित होंगे. बहरहाल, अपनी पीड़ा को, गुस्से को एक गीत की शक्ल में ढाल कर पेश कर रहा हूँ. आम आदमी पढ़े न पढ़े, कुछ लेखक या चिट्ठाकार तो पढ़ेंगे ही. खैर, पढ़ें न पढ़े, मुझे तो लिखना ही है.

लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है.
लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है.

वर्दी में शैतान छिपे है, कुर्सी पर मक्कार बहुत.
जनता को ये रौंद रहे है, देखो बारमबार बहुत.
कहीं पे डंडा चलता है तो कही पे थप्पड़ भारी.
लोकतंत्र की छाती पर अब ये कुर्सी हत्यारी.
नीच हो गयी नीक व्यवस्था, घायल श्वेत परिंदा है.
लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है.

खुले आम अब लोग पिट रहे, कैसा है जनतंत्र
जनता ही मारी जाती है, रोज़ नया षड्यंत्र .
अफसर जालिम बन बैठे है, अंगरेजी संतानें.
इनको हम ही पाल रहे , कोई माने या ना माने.
जनता का हर इन्कलाब भी इनको लगता निंदा है.
लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है.

उठो-उठो मुर्दे मत बनना, अब थोड़ा चिल्लाओ तुम.
जहाँ पराजित लोकतंत्र हो, बिलकुल शोर मचाओ तुम.
देश में अफसर नही देश की जनता का ही शासन है.
हाय अभी तक यहाँ हंस रहा, दुर्योधन-दुशासन है.
लोकतंत्र का हर हत्यारा, अफसर नहीं दरिंदा है.
लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है...


11 टिप्पणियाँ:

राजीव तनेजा January 24, 2010 at 11:23 AM  

सोने नहीं देती है
दिल की चौखट पे
ज़मीर की ठकठक
उथल-पुथल करते
विचारों के जमघट
जब बेबस हो
तमाशायी हो
देखता हूँ अन्याय हर कहीं

फेर के सच्चाई से मुँह
कभी हंस भी लेता हूँ
ज़्यादा हुआ तो
मूँद के आँखें
ढांप के चेहरा
पलट भाग लेता हूँ कहीं

आफत गले में पड़ी
जान पड़ती मुझको
कुछ कर न पाने की बेबसी
जब विवश कर देती मुझको
असमंजस के ढेर पे बैठा
मैं नीरो बन बाँसुरी बजाऊँ कैसे

क्या करूँ कैसे करूँ
कुछ सूझे न सुझाए मुझको
बोल मैं सकता नहीं
विरोध कर मैं सकता नहीं
आज मेरी हर कमी
बरबस सताए मुझको

ऊहापोह त्याग कुछ सोच
लौट मैं फिर
डर से भागते कदम थाम लेता हूँ
उठा के कागज़-कलम
भड़ास दिल की
कागज पे उतार लेता हूँ मैं


ये सोच चंद लम्हे
खुशफहमी के भी जी लेता हूँ कि
होंगे सभी जन आबाद
कोई तो करेगा आगाज़
आएगा इंकलाब यहीं ...
हाँ यहीं

गिरीश पंकज January 24, 2010 at 11:29 AM  

rajiv bhai, sundar pratikriyaa. aise hi krantikaaree vichaar loktantra ko zinda rakhenge.blogaro ko aapki tarah hi jivant hona chahiye. ve apane samay se samvaad kare. aapne mera hausala barhaa diya.

Kusum Thakur January 24, 2010 at 6:11 PM  

"लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है..."
वाह क्या खूब बात कही है आपने बहुत ही अच्छी और सटीक रचना !!

"फेर के सच्चाई से मुँह
कभी हंस भी लेता हूँ
ज़्यादा हुआ तो
मूँद के आँखें
ढांप के चेहरा
पलट भाग लेता हूँ कहीं"

राजीव जी ,
वाह ! आपकी प्रतिक्रया पर प्रतिक्रिया देने से मैं अपने आप को नहीं रोक पाई . बहुत ही अच्छी रचना है .

योगेश स्वप्न January 24, 2010 at 6:31 PM  

wah , andolankari/krantikari rachna, kash desh ki janta tak apka avahan pahunche aur janta jage.

Suman January 24, 2010 at 6:32 PM  

nice

वन्दना अवस्थी दुबे January 25, 2010 at 4:03 AM  

बहुत खूब. जोशीली रचना. गणतंत्र दिवस मुबारक हो.

श्रद्धा जैन January 25, 2010 at 6:40 AM  

bahut katu satay likha hai aapne pankaj ji

aise hi teekhe kathor shabdon mein inki aalochna chetna laayegi

शहरोज़ January 25, 2010 at 5:52 PM  
This comment has been removed by the author.
शहरोज़ January 25, 2010 at 5:54 PM  

जूते की तरह लोकतंत्र लटकाए
भागे जा रहे हैं सभी सीना फुलाए!

आपकी पंक्तियाँ पढ़ते हुए सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की यह पंक्ति विडंबना को और तिक्त करती रही!

आप दिल्ले आये और चले भी गए!! आइन्दा भैया सूचना मुझे मिलनी चाहिए, यह छोटे भाई की नाराजगी है!

वरुण कुमार सखाजी January 26, 2010 at 9:49 AM  

I like this post because only one word is there, where has written "Dhara laga do" What actually DHARA we have done all of things codify and doing aswell, still could not controll like this activity occurances.......why??????????????? I have an answer......नियम वही है जो सही है क़ायदो के नाम पर क़यामत ना बरसने दें।

दिव्य नर्मदा divya narmada January 30, 2010 at 1:26 AM  

girish ji!

neta aur afsar milkar lok tantra ko kha gaye hain. satta inheen ke hathon men hain. adalaten, pulis, patrkar aur vyapari inke sahayak hain. aam adami asahaay hai. yahee kaduvaa sach hai.

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