''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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महावीर वचनामृत-३

>> Wednesday, January 27, 2010


तीसरी कड़ी...
(21)
चोरी, हिंसा, झूठ सब, 
परिग्रहों के पाप।
जो इनमें रमता रहा,

अंत मिले संताप।।

(22)
ज्ञानी हिंसक ना बने,

करे सभी से प्रीत।
धर्मप्राण का पथ यही,

महावीर की रीत।।

(23)
धर्मप्राण जन जागते,

अधम सोय दिन-रात।
जागो, आलस छोड़ दो,

मात करे प्रतिघात।।

(24)
क्रोधी, रोगी, आलसी, 

मूढ़, घमंडी पाँच।
रहें ज्ञान से दूर ये,

नहीं साँच को आँच।।

(25)
गुरू अपना ज्यों दीप है, 

करे तिमिर का नाश।
जीवन भर जलता रहे, 

करता रहे प्रकाश।।
सुधी पाठकों से अनुरोध है, कि वे मेरे नए चिंतन पर (व्यंग्य दर्पण)भी एक नज़र मार लिया करे...

3 टिप्पणियाँ:

श्याम कोरी 'उदय' January 27, 2010 at 5:00 PM  

.... बेहद प्रभावशाली दोहे, बधाई !!!!

योगेश स्वप्न January 27, 2010 at 5:49 PM  

गुरू अपना ज्यों दीप है,
करे तिमिर का नाश।
जीवन भर जलता रहे,
करता रहे प्रकाश।।


aapko padhkar anand ata hai.

दिव्य नर्मदा divya narmada January 30, 2010 at 1:23 AM  

uttam

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