''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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ghazal /chhal ke bal par.....

>> Monday, January 11, 2010

एक ताज़ा ग़ज़ल पेश है. मुंबई में ही बनी. शहर केचरित्र को जैसा समझा, उसे शेरों में ढालने की कोशिश की है. लेकिन विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि यह ग़ज़ल मुम्बई को समर्पित नहीं है. वहां भी अच्छे लोग है. मुझे तो मिले ही. हर शेर उस प्रवृत्ति को समर्पित है, जो लोक व्यापी है. ऐसे लोग कहीं भी मिल जायेंगे. दिल्ली में, रायपुर, झुमरीतलैया में, तिम्बक्तूं में, भाटापारा में या कही भी.बहरहाल एक  कोशिश की है, शेर देखे-
ग़ज़ल...

छल के बल पर टिका रहे यह जीवन कब तक
समझेंगे सूखी लकड़ी को चंदन कब तक 


तेरी इस बस्ती में टोपीबाज़ मिले सब
आखिर हमको यहाँ मिलेंगे सज्जन अब तक


सबके सब तो यहाँ कर रहे धंधा-पानी
हमसे ही फ़ोकट में होगा सर्जन कब तक


बदले में तुम धन्यवाद तक बोल न पाए 
खाली-पीली हमीं करें अभिनन्दन कब तक 


वो तो अधिनायक बन कर के लूट रहे हैं
बेचारी जनता गायेगी जन-गण कब तक 


सुनो मेरी फ़रियाद सुनोगे निष्ठुर कब तक 
सुख से मेरी यहाँ रहेगी अन-बन कब तक 


आ जाओ तुम इतना भी अब मत शरमाओ
शर्मोहया के टूटेंगे ये बंधन कब तक


चालू होने का ठेका वो ले कर बैठे
और रहे 'पंकज' गोपाला ठनठन कब तक

4 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari January 11, 2010 at 12:35 PM  

सुनो मेरी फ़रियाद सुनोगे निष्ठुर कब तक
सुख से मेरी यहाँ रहेगी अन-बन कब तक


हर शेर पूरा और शानदार...आनन्द आ गया!!

योगेश स्वप्न January 11, 2010 at 5:43 PM  

hamesha ki tarah behatareen. pankaj ji bahut achcha laga padh kar.

नीरज गोस्वामी January 11, 2010 at 11:51 PM  

पंकज जी आपके इस नए रंग ने भी आनंद ला दिया...बेहतरीन रचना...बधाई
नीरज

दिव्य नर्मदा divya narmada January 20, 2010 at 7:19 AM  

ruchikar rachna.

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